गुरु महिमा से जुड़ी इन बातों को समझनी है तो आप नामदेव महाराज से जुड़े प्रंसग से समझ सकते हैं। जिसके बारे में बताते हुए सद्गुरु अपनी किताब गुरु ही मुक्तिदाता में लिखते हैं कि-महाराज नामदेव पहले दर्जी थे, बचपन में एक बार नामदेव के नाना जी बाहर जाने लगे तो उन्होंने नामदेव से ठाकुर जी को भोजन कराने को कहा इस दौरान नाना जी ने उन्हें एक हफ्ते का राशन भी दिया। नामदेव बच्चे थे, इसके बावजूद उन्होंने भोजन बनाया और ठाकुर जी के सामने रखकर खाने को कहा। थोड़ी देर बाद नामदेव ने देखा कि ठाकुर जी ने भोजन नहीं खाया है, नामदेव को लगा कि खाने के साथ मैंने पानी नहीं दिया, इस वजह से वह खाना नहीं खाए होंगे। फिर नामदेव महाराज उनके लिए पानी लेकर आए और खाने के लिए कहा। कुछ समय बीतने के बाद वह फिर से ठाकुर जी को देखने आए। चूंकि खाने के साथ पानी रखने के बाद भी ठाकुर जी ने भोजन नहीं किया था। ऐसा देख नामदेव महाराज थोड़े से चिंतित हुए फिर उनको लगा कि ठाकुर जी खाना खाने से शरमा रहे हैं इसलिए उन्होंने ठाकुर जी के आस-पास पर्दा कर दिए। पर्दा करने के बाद वह फिर से बाहर चले गए और कुछ देर बाद वापस आए। वापस आने के बाद उन्होंने पर्दा हटाते हुए इस उम्मीद से देखा कि ठाकुर जी भोजन कर चुके होंगे। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं था क्योंकि ठाकुर जी ने अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया था। इसी बीच भोजन को उसी स्थान पर पड़ा देख नामदेव जी को गुस्सा आया और वह एक डंडा लेकर चले आए।
नामदेव ने भगवान को डंडे से पीटने की बात क्यों कही ?
डंडा दिखाते हुए नामदेव जी ने ठाकुर जी से कहा कि खाना खाओ नहीं तो डंडे से पिटाई करूंगा। कुछ समय बाद नामदेव जी ने जैसे ही ठाकुर जी को मारने के लिए डंडा उठाया वैसे ही ठाकुर जी प्रगट हो गए और भोजन करना शुरू कर दिए। ठाकुर जी को भोजन करता देख नामदेव जी उनका हाथ पकड़ लिए और कहा कि- सारा तू ही खा जाएगा, तो मैं क्या खाऊंगा..
हालांकि ठाकुर जी नामदेव जी की बातों को अनसुना करते हुए बोले कि भूख लगी इसलिए खा रहा हूं। फिर नामदेव बोले-
तू बहुत खाता है चल कल से और अधिक बना दूंगा..
नामदेव की बातों को सुन क्यों चौंक गए उनके नाना ?
धीरे धीरे नामदेव जी ऐसे ही भोग लगाते गए और ठाकुर जी खाते गए। नतीजा यह हुआ कि एक हफ्ते का राशन तीन दिन में ही खत्म हो गया। हालांकि नामदेव महाराज, ठाकुर जी को भोजन कराना नहीं छोड़े। वह लाला के पास से राशन उधार लेकर लाए और ठाकुर जी को भोग लगाना जारी रखा। एक हफ्ते बीत जाने के बाद नाना जी घर पर लौटे और नामदेव महाराज से भोग लगाने के बारे में पूछा।
नाना जी को सबकुछ बताते हुए नामदेव ने कहा कि- “हां मैंने आपके ठाकुर को भोजन करा दिया और उधार में राशन भी लेकर आया, क्योंकि आपका ठाकुर बहुत खाता है। एक हफ्ते का राशन उसने तीन दिन में ही खत्म कर दिया। नामदेव जी की बातों को सुन नाना जी हैरान हो गए। उन्होंने चौंकते हुए उनसे पूछा कि क्या तुम सच बोल रहे हो ? ठाकुर जी ने कब भोजन किया। इन बातों को सुन नामदेव जी ने सारी घटना बता डाली। धीरे धीरे नामदेव जी की ख्याति फैलती गई क्योंकि वह भगवान कृष्ण के परम भक्त हो गए थे।
एक स्त्री ने कैसे तोड़ा नामदेव का भ्रम ?
नामदेव महाराज अब बडे होने लगे थे, इसी बीच उनकी मुलाकात ज्ञान देव से हुई। एक बार ज्ञानदेव ने उन्हें अपने घर पर आने का निमंत्रण दिया। कुछ दिन बाद नामदेव जी ज्ञानदेव के घर पहुंचे, उनके आगमन पर ज्ञानदेव के साथ उनके पूरे परिवार ने खूब सेवा सत्कार किया। हालांकि ज्ञानदेव की बहन मुक्ता बाई ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। वहां मौजूद लोगों ने उनसे इसका कारण पूछा। मुक्ता बाई ने कहा कि नामदेव अभी सिद्ध नहीं हैं वह असिद्ध हैं..
कुम्हार ने ऐसा क्या कहा कि रोने लगे नामदेव ?
नामदेव को लेकर मुक्ता बाई जो बता रही थी, उनकी बातों पर लोग भरोसा नहीं कर पा रहे थे। इसलिए उनकी परीक्षा लेने के लिए गोरा कुम्हार को बुलाया गया। कुछ समय के अंदर वहां महात्माओं की सभा भी आ पहुंची। गोरा कुम्हार ने परीक्षा लेना शुरू किया और अपने हाथ में लिए डंडे से नामदेव महाराज के सिर पर मारा। ऐसा होता देख नामदेव जी ने कहा कि तुम धुर्त हो क्या ? तुम मुझे मार रहे हो। तुम्हे पता नहीं मैं भगवान से बात करता हूं..
कुछ समय बाद कुम्हार ने कहा कि यह असिद्ध है क्योंकि यह कच्चा घड़ा है…
समाज की ऐसी बातों को सुन नामदेव महाराज वहां से दौड़ भागे और बंद कमरे में आकर रोने लगे कुछ समय बाद उन्होंने ठाकुर जी से बात करना शुरू किया और कहा कि गोरा कुम्हार मुझे असिद्ध कह रहा है समाज भी असिद्ध कह रहा, मुझसे बड़ा सिद्ध कौन होगा जो तुमसे बातें करता है। इसी दौरान भगवान कृष्ण नामदेव जी के समक्ष प्रकट हुए और बताया कि जब-जब हम मानव शरीर धारण करते हैं तब-तब गुरु द्वार पर जाना होता है, क्योंकि मनुष्य जन्म बिना गुरु के आशीर्वाद का सफल नहीं होता, इसलिए तुम्हारी सिद्धी तब तक पूरी नहीं होगी जब तक तुम्हें गुरू का आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो जाता। अंतत: नामदेव महाराज को यह बात समझ आई और उन्होंने अपनी गुरु की तलाश शुरू कर दी।