पूरे भारतवर्ष में Navratri मनाई जा रही है। यह त्यौहार भारत के मनीषियों और ऋषियों की खोज है, जिसे भारतीयों के द्वारा बड़े ही उमंग से मनाया जाता है। नवरात्र का तात्पर्य नयापन से होता है, जिस दौरान हर इंसान जप-तप के माध्यम से खुद में नई ऊर्जा भर सकता है। यह भारत का एक ऐसा पर्व है, जिसको सच्चे दिल से मानने वाला इंसान पूरे नवरात्र ध्यान साधना में लीन रहता है। पौराणिक तथ्यों की माने तो- नौ दिनों के नवरात्र में किया गया तप साल भर के तप के बराबर होता है।
क्या होता है मंत्र? क्यों करना चाहिए मंत्रों का जाप ?
ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।
मां दुर्गा को समर्पित यह मंत्र पूरे नवरात्र के दौरान सुनने को मिलता है। लेकिन क्या आपको पता है कि, आप जिन मंत्रों का जाप करते हैं, उसका वास्तविक अर्थ क्या है। दरअसल, मंत्रों के जाप का सीधा तात्पर्य मन की शांति से जुड़ा होता है। सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज मंत्रों के जाप को लेकर कहते हैं कि- जो मन को शांत करता है वही मंत्र है, हर एक सम्प्रदाय का अपना-अपना एक मंत्र होता है, पूरा संप्रदाय किसी ना किसी मंत्र पर खड़ा है। जब आप जाप करते हैं तो आपके मुख से निकलने वाले शब्द आकाश में एक चक्र के रूप में मिल जाते हैं और आपके द्वारा किया गया जप-तप ही आपके ऊपर बरसता है।
सद्गुरु की इन बातों को सीधे शब्दों में समझा जाए तो, इस संसार में हमारे कर्म ही हमें फल के रूप में प्राप्त होते हैं, चाहे वो गाली हो या मंत्र। इसके अलावा नवरात्र में पूरा वातावरण पवित्र होता है… इसमें जैसे ही कोई इंसान योग करता हैं तो उसका फायदा उसे नौ दिनों के उपवास के दौरान मिलता है।
क्या उपवास के बिना पूरा नहीं होता Navratri का व्रत ?
कहा जाता है कि नवरात्र का पर्व उपवास के बिना पूरा नहीं होता, लेकिन इसको लेकर एक सच्चाई यह भी है कि, उपवास का अर्थ केवल भूखे रहना ही नहीं, बल्कि अपने परमात्मा में मग्न होकर जप-तप और साधना करना भी होता है… हालांकि कम मात्रा में भोजन करना हमेशा इंसानी शरीर के लिए फायदेमंद होता है। वैज्ञानिकों की माने तो- कम भोजन से शरीर का पाचन तंत्र मजबूत होता है और पेट की चर्बी भी कम होती है, हालांकि हमारे समाज में उपवास को लेकर एक धारणा बना दी गई है कि, नवरात्रि के नौ दिनों इंसान भोजन से जितना दूर रहे उसके व्रत की पवित्रता उतनी ही बनी रहती है। लेकिन अध्यात्म से लेकर वैज्ञानिक तर्क कभी भी व्यक्ति को खाने से दूर नहीं करता।
Navratri को लेकर क्या कहती है ‘सद्गुरु’ की किताब ?
सद्गुरु अपनी किताब ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ में नवरात्र नाम के अध्याय में जोर देकर लिखते हैं कि- नवरात्र में भोजन के नाम पर कोसों दूर भागने वाला इंसान यदि यह समझकर व्रत कर रहा है कि, कम खाने से उसे सिद्धी की प्राप्ति होगी तो, शायद वो गलत हो सकता है, क्योंकि वेदों में कहा गया है कि- जो आप अखंड ब्रहांम्ड परमात्मा को देखते हुए नवरात्र का व्रत कर रहे हैं, वो खुद आपके शरीर में विद्यामान है। सद्गुरु इन बातों को समझाते हुए बताते हैं कि- जब प्रभु राम प्रगट हुए तो उन्होंने इस संसार का कल्याण करने से ज्यादा अपनी मां कौशल्या का कल्याण किया, क्योंकि कौशल्या के गर्भ से राम का अवतरण हुआ। वैसे ही किसी भी इंसान का हृदय एक ऐसी जगह होती है… जहां परमात्मा निवास करते हैं।
व्रत-उपवास को लेकर क्या कहते हैं सद्गुरु ?
स्वामी कृष्णानंद जी महाराज हमेशा अपने प्रवचनों के माध्यम से शिष्यों को सही मार्ग पर ले जाते हैं। साल 2002 में नवरात्रि के अवसर पर दिए गए प्रवचन पर जब आप गौर करेंगे तो आपको इंसानों द्वारा किए गए कर्म और उनके आधार पर प्राप्त फलों की व्याख्या मिलेगी। जिसको लेकर सद्गुरु ने कहा था कि-
“हममें से अधिकतर लोग उधार का सौदा करते हैं। हम सोचते हैं कि, आज के कर्मों का फल हमें अगले जन्म में प्राप्त होगा, लेकिन जिन लोगों की सोच भूत और भविष्य को छोड़ वर्तमान पर टिकी रहती है। वही एक अच्छे साधक बनते हैं और उनके द्वारा किया गया हर व्रत सफल होता है”