भारत में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आत्मिक स्वच्छता से जुड़ा हुआ है। इंसान बाहर से चाहे कितना भी भक्ति का आडंबर रच ले, लेकिन जब तक उसके भीतर की धूल नहीं झाड़ी जाती, तब तक वह सच्चे अर्थों में धार्मिक नहीं बन सकता। सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी अमूल्य कृति “स्वर से समाधि” के अठारहवें अध्याय में इसी बात को बेहद सहज शब्दों में समझाया है। वे कहते हैं,“जैसे बाहरी दुनिया में हर जगह बाज़ार सजा है, जहाँ लोग वस्तुएँ खरीदते-बेचते हैं, उसी तरह भीतर भी एक बाज़ार है जहाँ विचार, इच्छाएँ, और संस्कारों का व्यापार चलता है। हम दिनभर में कई सौदे करते हैं, कभी नाम का, कभी यश का, कभी धन का। लेकिन इस व्यापार में जो चीज़ सबसे ज़्यादा खो जाती है, वह है आत्मा की शुद्धता।
क्या कहते हैं संत कबीरदास?
कबीरदास जी ने इसी सत्य को बड़ी सरलता से कहा था। कबीर का संकेत साफ़ है, अगर तू सच्चा व्यापारी बनना चाहता है तो पहले अपने भीतर का कूड़ा निकाल। क्योंकि झूठ, लालच और दिखावे की धूल मन को मैला कर देती है। सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज लिखते हैं,आज का धर्म मेले जैसा हो गया है। सब भक्त बनने की बात करते हैं, पर किसी के कानों तक गुरु का शब्द नहीं पहुँचता। दुनिया वैष्णव तो बन गई है, पर भीतर अब भी वैर, लोभ और ईर्ष्या का जाल बिछा हुआ है।
जउ तू साँचा बनियाँ, साँची हाटि लगाऊँ।
अन्दर झारू देइ के, कूरा दूरि बहाऊँ॥
गुरु और शिष्य के रिश्ते पर सद्गुरु का दृष्टिकोण
सद्गुरु कहते हैं,गुरु लोभी, सिष लालची, दोनों खेलें दाँव। जब गुरु और शिष्य दोनों ही अपने-अपने स्वार्थ के व्यापारी बन जाएँ, तो साधना, साधना नहीं रह जाती। वह केवल सौदा बन जाती है। सद्गुरु चेतावनी देते हैं कि अगर मन के कचरे को बस झाड़ कर दरवाज़े पर छोड़ दिया, तो वह लौटकर फिर भीतर आ जाएगा। इसलिए उसे पूरी तरह बहा देना ज़रूरी है, जैसे नदी अपने साथ सारी गंदगी बहा ले जाती है।
सद्गुरु की दृष्टि में स्वर साधना
“स्वर से समाधि” में स्वामी कृष्णानंद जी महाराज बताते हैं कि जब साधक अपने स्वर को पहचान लेता है, तो वही स्वर उसे उसकी आत्मा की जड़ तक पहुँचा देता है। वह स्वर सांसों की माला बन जाता है, जो हर क्षण मन को शुद्ध करता है। वे कहते हैं, सच्चा गुरु वह नहीं जो दिखावे में लिप्त हो, बल्कि वह जो अपने शिष्य के भीतर झाड़ू दे सके। मन के मैल को दूर कर सके। सद्गुरु के अनुसार, सच्ची साधना का अर्थ है, मन को स्वच्छ करना, न कि धर्म का प्रदर्शन करना। जब साधक अपने भीतर के झूठ, लोभ और मोह को पूरी तरह धो देता है, तब वही व्यक्ति “निर्मल व्यापारी” बन जाता है, जो केवल सत्य का व्यापार करता है। अंदर झाड़ू देइ के, कूड़ा दूरि बहाऊँ, यही है वह वाक्य, जो आज हर साधक के लिए सबसे बड़ा मंत्र बन सकता है। क्योंकि सांसों की माला से जब मन शुद्ध होता है