क्या आप भी किसी मंत्र को मन ही मन जपते हैं और उसे ही अजपा जप मान लेते हैं? क्या आपके गुरु ने आपको प्रत्यक्ष रुप से कोई ऐसा अजपा मंत्र दिया है जिससे आपके जीवन मे परिवर्तन आया हो?
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की पुस्तक ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ में इस रहस्य को पहली बार दुनिया के सामने रखा गया है कि अजपा मंत्र वास्तव में है क्या और इसके प्रयोग से कैसे ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है?
मंत्र जपने की सर्वश्रेष्ठ विधि है अजपा
मंत्र जपने की अजपा विधि सार्वभौमिक उर्जा के क्षय तथा संरक्षण के सिद्धांत पर कार्य करती है। हम श्वास लेते हैं और फिर उसका त्याग करते हैं। हमारे श्वास के साथ जो भी आक्सिजन हमारे अंदर जाता है और शरीर उसका जो भी भाग ग्रहण करता है उसे प्राण कहते हैं।
इसी प्राण के असंतुलन से व्यक्ति में , समाज में कई प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। लेकिन अजपा की सम्यक आवृत्ति से , श्वास की दिशा, और प्रवाह अपने आप विपरीत दिशा में होने लगता है। जिससे प्राण का संरक्षण तथा संचय होने लगता है। संतुलन हो जाता है।
जैसे जैसे उर्जा की वृद्धि होती है, व्यक्ति की शारीरिक क्षमता की वृद्धि होती है। बाद में इसके परिष्कृत होने पर मानसिक विकास के साथ साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है।
उच्च मानसिक और शारीरिक संतुलन होने के पश्चात शक्ति घनीभूत होने लगती है। जो अध्यात्मिक शक्ति में बदल जाती है। इसी स्थिति को पूर्ण संतुलन कहते हैं। आध्यात्म की भाषा में आत्म साक्षात्कार कहते हैं।
इस विधि को बताने-सिखाने की कला को ही दीक्षा कहते हैं। यही जीवन का विज्ञान है। यही मृत्यु का ज्ञान है। अजपा अर्थात जिसे दोहराया न जा सके। जिसमें कंठ या गले की ज़रूरत ही नहीं है।
जो बिना किसी प्रयास के स्वतः होता हो वही अजपा है। यही महामंत्र है। चूंकि जो स्वतः जाप हो रहा हो, से ही महामंत्र कहते हैं। सद्गुरु उसी ध्वनि को शिष्य को सुनाता है। यही शब्द मंत्र है, यही पूर्ण जीवन का केंद्र है।
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज अपनी पुस्तक गुरु ही मुक्तिदाता में अजपा के विज्ञान को बताते हुए कहते हैं कि श्वासों का सही विनियमन ही अजपा का विज्ञान है।
प्रत्येक व्यक्ति प्रति मिनट में प्रंदह बार श्वास लेता है। इसी प्रकार प्रति घंटा नौ सौ बार वो श्वास लेता है। चौबीस घंटे में इक्सीस हजार छह सौ था एक वर्ष में अठहत्तर लाख चौबीस हजार बार श्वास लेता है।
चूंकि मनुष्य एक मिनट मे पंद्रह बार श्वास लेता है। एक श्वास में धड़कनों की संख्या पांच होती है। इसी प्रकार प्रति मिनट पचहत्तर तथा प्रति घंटा पांच हजार पांच सौ होगा । चौबीस घंटे में एक लाख आठ हजार बार होता है । यही कारण है कि साधक 108 मनकों की माला पहनता है।
प्रति श्वास में पांच बार स्पंदन होता है । जिससे शब्द उत्पन्न होता है । यही शब्द मंत्र है। यही महामंत्र है। जिस क्षण गुरु उसे बता देता है, शिष्य का दूसरा जन्म हो जाता है अर्थात वो द्विज हो जाता है। वही द्विज आत्मसाक्षात्कार करने के बाद ब्राह्मण हो जाता है।
जो इस विधि को शिष्य में हस्तांतरित करता है – वही सद्गुरु है। जो एक दीपक से दूसरे दीपक को प्रज्वलित कर देता है वही है आपका सद्गुरु।