राम नाम की महिमा सारे संसार में गाई जाती है। कहा जाता है कि राम नाम में कुछ ऐसा चमत्कार है जो किसी भी इंसान का जीवन बदल देती हैं। आज भी करोड़ों लोग प्रतिदिन राम नाम का जप करते हैं और इस भवसागर से खुद को पार करा लेते हैं । स्वयं कबीरदास जी कहते हैं कि
“कबीर सब जग निर्धना, धनवंता नहीं कोय।
धनवंता सोई जानिये, जाके राम नाम धन होय॥”
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं कि सांसारिक धन-दौलत के मामले में यह पूरा संसार ही निर्धन (गरीब) है, क्योंकि यह धन स्थायी नहीं है।वास्तविक रूप से धनवान केवल वही व्यक्ति है, जिसके पास ‘राम नाम’ रूपी अनमोल और शाश्वत धन है।
तुलसी के राम की महिमा
कबीर के राम निर्गुण राम हैं, निराकार राम हैं जबकि गोस्वामी तुलसीदास जी के राम सगुण साकार दशरथ पुत्र श्रीराम हैं। लेकिन राम का नाम निर्गुण ईश्वर के लिए प्रयोग हुआ हो या फिर सगुण राम के लिए इस नाम की महिमा पर कोई असर नहीं पड़ता है। तभी तो सगुण परंपरा के महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी भी कहते हैं कि –
“राम नाम मनिदीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहरेहु, जौं चाहसि उज्यार॥”
तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि आप अपने भीतर (मन में) और बाहर (संसार में) उजाला यानी शांति और ज्ञान चाहते हैं, तो अपनी जीभ रूपी चौखट पर ‘राम नाम’ रूपी मणियों का दीपक जलाकर रख लीजिए।
राम नाम से कुंडलिनी जागरण?
विश्व विख्यात सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तक ‘मेरे राम’ ने राम के नाम का जो अर्थ बताया है वो वास्तव में राम नाम के अर्थ के पूरे रहस्य को खोल देता है।
सद्गुरु कहते हैं कि ढाई अक्षर का ये राम नाम श्रेष्ठतम शब्द है। र का उच्चारण करते ही मूलाधार चक्र पर जोर पड़ता है। जैसे किसी ऊर्जा ने मूलाधार चक्र से गति आरंभ कर दी है।
अ अक्षर आते ही वह परम ऊर्जा जैसे मणिपुर चक्र पर आ जाती है। म अक्षर आते ही वह ऊर्जा आज्ञा चक्र पर रुक जाती है। उच्चारण समाप्त होते ही मुँह स्वतः बंद हो जाता है ।
राम शब्द के बार बार उच्चारण मात्र से साधक की सोयी हुई कुंडलिनी मूलाधार चक्र से जाग्रत हो जाती है। सारे मलों को जला कर भस्म कर देती है। साधक के आज्ञा चक्र पर आकर विश्राम करने लगती है। वहीँ गुरु पर्वत भी है । गुरु के इशारे मात्र से वह ऊर्जा सहस्त्रार चक्र में प्रवेश कर समाधि को उपलब्ध हो जाती है।
राम नाम में छिपे मंत्र का रहस्य
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी अपनी पुस्तक ‘मेरे राम’ में कहते हैं कि र+ अ+ म के संयोग से राम शब्द बना है। र- यह अग्नि का बीज मंत्र है।
अग्नि साधक के अंदर के मलावरण को जलाकर भस्म कर देती है। मूलाधार चक्र के चारो तरफ विजातीय गैस , अवयव, जन्मों जन्मों से पड़े रहते हैं। उसे यह र रुपी अग्नि जला देती है। जिससे साधक अंदर से हल्का हो जाता है। जिससे कुंडलिनी का जगरण एवं गमन उर्ध्व दिशा में स्वतः हो जाता है।
राम नाम में छिपा ज्ञान
अ सूर्य का बीज मंत्र है। .ह स्वर का प्रथम अक्षर भी है। इसके उत्पन्न होने से ही सारे स्वर तत्पश्चात वयंजनों, अक्षरों की उत्पत्ति हुई है। अ अक्षर वर्णमाला का उद्गम स्रोत है।
अ अर्थात सूर्य का बीज मंत्र । सूर्य अर्थात ज्ञान। साधक अंदर से परम प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है। उसके अंदर से स्वतः वेद का उच्चारण होने लगता है।
मणिपुर चक्र पर अग्नि का स्थान है। वही भगवान विष्णु का भी स्थान है। जहाँ से पूरे शरीर का पोषण होता है। वह विशुद्ध चक्र तक ध्वनित होता है।
विशुद्ध चक्र सोलह कमल दल है। जिसके प्रथम कमल दल पर अ अक्षर ही ध्वनित होता है। जिसकी देवी आद्या हैं। जो समस्त मृत्युलोक , पाताल लोकों का संचालन करती हैं एवं उसकी सूचना उर्ध्व लोक को भेजती हैं।
राम नाम में अमृत तत्व
म- चंद्रमा का बीज मंत्र है। चंद्रमा शीतलता प्रदान करता है। वह अमृत देता है। जिससे साधक के संपूर्ण शरीर में नव ऊर्जा का संचरण होता है। वह अमृत साधक के सहस्त्रार से अहिर्निश बरसता रहता है।
सहस्त्रार से गिरने वाला ये अमृत अमरलिंग पर आकर गिरता है। जिससे साधक के शरीर अर्थात ब्रह्मांड से पाताल यानि पैर तक का पोषण होता है। पूरा लोक उसी अमृत वर्षा से तृप्त होता है।
साधक पर गुरु की अनुकंपा बरसती है । साधकी की स्थिति वैसी ही हो जाती है जैसे नीचे से गंगा का पानी बढ़ रहा हो, जिसमें साधक डूब रहा हो। वह सहज समाधि मे प्रवेश कर जाता है।
यही राम के नाम का चमत्कार है । यही राम के नाम का रहस्य है। हरि ऊँ।