आज संसार में विशेषकर सनातनधर्मी भारतवर्ष में लगभग प्रत्येक गली कूचे में तथाकथित गुरुओं की भरमार हो गई है। ऐसे में सच्चे गुरु की खोज वास्तव में पहले से बहुत ही कठिन हो गया है।
पूज्य सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की वाणियों और उनके द्वारा रचित ग्रंथों के अध्ययन से सच्चे गुरु की खोज इस कलियुग में आसान हो सकती है ।
ग्रंथो में गुरु की खोज के मंत्र
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुरु ही मुक्तिदाता’ के ‘गुरु की खोज’ अध्याय में पूज्य गुरुदेव इसकी शुरुआत ही महान ईसाई धार्मिक ग्रंथ बाईबिल में दिए गए ईसा के संदेश से करते हैं –
“जो मेरी अपेक्षा अपने माता- पिता को अधिक प्यार करता है , वह मेरे उपयुक्त नहीं है।“
बाईबिल का ये कथन रामचरितमानस के सुंदरकांड में श्रीराम के द्वारा दिए गए इस कथन से भी पुष्ट होता है जब श्रीराम कहते हैं कि –
“जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥“
अर्थात् भगवान कहते है कि माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है मैं उसका कल्याण कर देता हूं।
गुरु की खोज में परमहंस योगानंद
पूज्य सद्गुरु ‘गुरु की खोज’ अध्याय में परमहंस योगानंद जी की कथा बताते हुए कहते हैं कि किस प्रकार जब वो एक बालक मुकुंद के रुप में बचपन से ही गुरु की खोज में , ईश्वर की खोज मे आतुर थे और बार बार घर से भाग जाया करते थे।
एक बार जब मुकुंद बनारस भाग गए तो वहां रास्ते में एक उन्हें अज्ञात संन्यासी मिले। उन संन्यासी ने मुकुंद को कहा कि भागो मत, गुरु में ही ईश्वर को खोजो।
मुकुंद उन संन्यासी से दीक्षा ले लेता है और एक वर्ष तक गुरु के आदेश का पालन करते हुए अपने जीवन को इस प्रकार परिवर्तित कर दिया को वो संसार में परमहंस योगानंद के रुप में विख्यात हो गए।
क्यों है गुरु के आदेश का पालन सबसे जरुरी?
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी कहते हैं कि गुरु के निर्देशों का पालन करने में खुद को इतना ढाल लो कि भगवान की चिंता भी छोड़नी पड़े तो छोड़ दो।
सद्गुरु कहते हैं कि गुरु के निर्देशों का पालन सही तरीके से कर लिया तो रामत्व, कृष्णत्व स्वयं तुम्हारे अंदर चला आएगा। ईश्वर के सारे गुण खुद ही तुम्हारे अंदर आ जाएंगे।
सद्गुरु कबीरदास भी यही कहते हैं कि –
ज्ञान स्वरुपी जो गुरु मिले तो क्यों तजि जाय।।
अर्थात गुरु की अनुकंपा ही काफी है। उसके अनुग्रह से आप रामत्व को उपलब्ध हो जाएंगे। सद्गुरु कहते हैं कि बस सुख और दुख में समत्व का भाव रखना पड़ेगा ।
भगवान श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं कि – सुख- दुखै समें कृत्वा लाभालाभौ जया जयौ।
गुरु की खोज के सूत्र
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी कहते हैं कि गुरु की खोज करने के लिए पहले आप खुद को निर्मल करो। अपने में शूद्रोचित, वैश्योचित, क्षत्रियोचित, विप्रोचित सेवा भावों को ग्रहण करें। सद्विप्र बनें । सद्विप्र बनते ही गोविंद आप पर कृपा करेंगे और उसी की कृपा से आपको गुरु का साक्षात्कार हो जाएगा।