भारत की पुण्यभूमि पर कबीर जैसे महान संतों ने न केवल आम व्यक्तियों का जीवन बदला बल्कि कई बादशाहों और सुल्तानों के अंदर भी आध्यात्मिकता का प्रवेश कराया। एक ऐसी ही कथा सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी की पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में मिलती है।
ये कथा लोदी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी की है जो दिल्ली सल्तनत का एक शक्तिशाली सुल्तान था और इस्लाम धर्म पर अडिग था। इब्राहिम लोदी के कई किस्से ऐसे है जो उसे एक अत्याचारी सुल्तान के रुप में दिखाते हैं, लेकिन कबीर से मिलने के बाद उसके जीवन मे जो परिवर्तन हुआ उसकी कथा बहुत ही रोचक है।
इब्राहिम लोदी क्यों बनवाना चाहता था एक विशाल महल?
सद्गुरु अपनी पुस्तक लोक परलोक में बताते हैं कि इब्राहिम लोदी एक विशाल महल बनवाना चाहता था जिसमें वो स्थाई रुप से निवास कर सके और अपने परमात्मा अल्लाह का भजन कर सके।
सद्गुरु बताते हैं कि जब वो ऐसा विचार कर ही रहा था तो उसे अपने दरवाजे के बाहर एक आवाज़ सुनाई पड़ी । कोई फकीर कह रहा था कि मुझे रास्ता दो लेकिन द्वारपाल उसे अंदर जाने की इजाजत देने से इंकार कर रहा था। ये विवाद बढ़ता ही जा रहा था।
फकीर कह रहा था कि मुझे अंदर जाने दो क्योंकि ये एक सराय है और उसे वहीं आज रात रुकना है। जबकि द्वारपाल लगातार उसे समझाने की कोशिश कर रहा था कि वो एक सराय नहीं बल्कि इब्राहिम लोदी का महल है।
फकीर से सुल्तान की मुलाकात
जब सुल्तान इब्राहिम लोदी को इस विवाद की जानकारी मिली तो उसने अपने मंत्रियों से पूछा कि बाहर कौन वो व्यक्ति है जो मेरे महल को सराय कह रहा है? जबकि एक साधारण से व्यक्ति को भी ये समझ में आ सकता है कि ये मेरा महल है कोई सराय नहीं।
आखिरकार सुल्तान इब्राहिम लोदी ने उस फकीर को अपने विशाल महल में अंदर लाने के लिए अपने द्वारपाल को आज्ञा दी। सुल्तान ने जब उस फकीर को देखा तो वो हैरान रह गया क्योंकि उस फकीर के चेहरे पर अद्भुत तेज था, उसकी आवाज़ में गजब का जादू था।
कौन था वो फकीर जिसने सुल्तान इब्राहिम का जीवन बदल दिया?
जब सुल्तान के बुलावे पर वो फकीर महल के अंदर पहुंचा तो सुल्तान ने देखा कि उस गरीब से फकीर के अंदर एक बादशाही चाल थी । वो सुल्तान के पास पहुंचा और उसे देखते ही सुल्तान सिंहासन छोड़ कर उठ खड़ा हुआ।
जब सुल्तान ने उसका परिचय पूछा तो उस फकीर ने कहा कि मैं अनामी हूँ, लेकिन मेरे इस शरीर को लोग कबीर कहते हैं। कबीर ने कहा कि मैंने इस सिंहासन पर पहले किसी और व्यक्ति को बैठे देखा था।
सुल्तान और कबीर का शास्त्रार्थ
सुल्तान कबीर की इस बात को सुन कर चौंका नहीं और उसके जवाब दिया कि हां इस सिंहासन पर पहले मेरे पिता बैठते थे लेकिन उनका अब निधन हो चुका है। लेकिन कबीर ने सुल्तान के साथ शास्त्रार्थ शुरु कर दिया और कहा कि मैं आपके पिता को जानता था लेकिन इससे पहले में भी मैंने इस सिंहासन पर किसी और को बैठे देखा है।
तब सुल्तान ने कहा कि वो मेरे पिता के भी पिता थे। वो भी अब मर चुके हैं। सुल्तान की बात सुनते ही कबीर हंसने लगे। कबीर ने सुल्तान को एक गहरी बात कही कि मैं जब दोबारा आउंगा तो क्या तुम्हे पक्का पता है कि तुम उस वक्त भी सिंहासन पर बैठे रहोगे?
कबीर ने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारा बेटा मुझे यहाँ बैठे दिखाई देगा और वो तुम्हारे बारे में यही कहेगा कि वो मेरे पिता थे जो अब मर चुके हैं? फिर तुम कैसे कह सकते हो कि ये जो विशाल महल तुम बनवाने जा रहे हो वो हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारा स्थाई निवास होगा?
कबीर ने महल को सराय क्यों कहा?
कबीर ने जब सुल्तान को ये कहा कि तुम जिसे अपना स्थाई महल मानते हो वो कभी भी तुम्हारे लिए स्थाई नहीं होगा क्योंकि तुम ही एक वक्त के बाद इस दुनिया से जा चुके होगे। इसलिए क्योंकि तुम्हारा महल ही नहीं से सारा संसार ही एक सराय है जहाँ लोग कुछ वक्त के लिए आते हैं और फिर अपनी दूसरी दुनिया में चले जाते हैं।
सुल्तान इब्राहिम ने कबीर को माना था अपना गुरु
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज अपने ‘लोक-परलोक’ पुस्तक में लिखते हैं कि कबीर की ऐसी बातें सुन कर सुल्तान इब्राहिम लोदी उनके चरणों में गिर पड़ा और उसने उन्हें अपना गुरु मान लिया। कबीर की बात सुनते ही वो अपना महल छोड़कर निकल गया और सीधे मरघट चला गया।
सुल्तान इब्राहिम का मरघट में निवास और ज्ञान की प्राप्ति
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी कहते हैं कि विरक्ति तो एकाएक आती है। किसी भी बुरी आदत को हम धीरे धीरे पकड़ते हैं लेकिन वो अचानक ही छूट जाती है। सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। वो इस संसार रुपी माया को छोड़ कर मरघट में जाकर रहने लगा जहाँ उसे धीरे धीरे ज्ञान की प्राप्ति हुई।
सुल्तान इब्राहिम को मिला कबीर का ज्ञान
सद्गुरु कहते हैं कि इब्राहिम लोदी जब मरघट में रहने लगा तो उसे कबीर का वो ज्ञान समझ में आ गया कि हम सभी इस संसार रुपी सराय में ही रहते हैं जबकि हमारी असली बस्ती तो मरघट है। यहाँ कोई मरता नहीं है बल्कि यहाँ आकर लोग चिर निद्रा में सो जाते हैं।
सुल्तान को कबीर की ये बात समझ में आ गई कि मरघट में सबकी अपनी-अपनी कब्रें होती हैं। कोई किसी से झगड़ा नहीं करता है। कभी कोई हटता नहीं है। संसार में तो सभी का पड़ाव होता है जैसे किसी सराय में होता है, मरघट में तो स्थाई निवास होता है।
आप सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की पुस्तक लोक-परलोक की प्रति को डाक से भी मंगवा सकते हैं। इसे मंगवाने का पता है
सद्गुरु धाम आश्रम, नांगलोई, दिल्ली