कुंडलिनी जागरण में मणिपुर चक्र का क्या रहस्य है?

पूज्य सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तकें ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में कुंडलिनी जागरण के सारे चक्रों के बारे में विस्तार से बताया है। पार्ट 3 में हम उनकी इन्हीं पुस्तकों से मणिपुर चक्र के रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं।

मणिपुर चक्र कुंडलिनी जागरण का तीसरा पड़ाव है। पहले पड़ाव मूलाधार चक्र को जाग्रत करने के बाद सुखद स्वप्न समाधि की अवस्था के चक्र में बड़े बड़े योगीजन फंसे रह जाते हैं. लेकिन सद्गुरु की कृपा से अगर वो मूलाधार चक्र को पार भी कर जाते हैं तो कई योगीजन स्वाधिष्ठान चक्र के प्रधान तत्व काम वासना के चक्कर में फंस जाते हैं।

लेकिन अगर सद्गुरु की कृपा बनी रहती है तो सद्गुरु उन्हें काम वासना, भय और घृणा के भावों से बाहर निकाल कर विचार शून्य करके अपने शिष्यों को स्वाधिष्ठान चक्र से भी आगे की यात्रा पर ले चलते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र के बाद तीसरा और महत्वपूर्ण चक्र का पड़ाव आता है उसे मणिपुर चक्र कहते हैं।

कहां स्थित है मणिपुर चक्र और क्या है उसकी विशेषताएं?

जहाँ मूलाधार चक्र गुदा मार्ग के पास स्थित होता है और स्वाधिष्ठान चक्र हमारी जननेंद्रिय के पास स्थित होता है, वहीं मणिपुर चक्र नाभि के पीछे रीढ़ की हड्डी में स्थित सषुम्ना नाड़ी में स्थित होता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में मणिपुर चक्र से सटीक स्थान को और भी ज्यादा स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि इसका स्थान नाभि भाग है। यहाँ दशदल कमल हैं। ये रंग में ध्रूम है। साधक यहाँ 10 से 15 हजार श्वासों का सतनाम( गुरु से प्राप्त मंत्र) के जाप के द्वारा पहुंच जाता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि मणिपुर चक्र की यात्रा मूलाधार चक्र के बाईं तरफ से निकल कर प्रत्येक चक्र में से वक्राकार होती हुई, आज्ञा चक्र के बाईं ओर समाप्त होती है।

मणिपुर चक्र को चंद्र, इड़ा या गंगा भी कहते हैं। इसी तरह मूलाधार चक्र के दायीं तरफ से यात्रा प्रारंभ करके प्रत्येक चक्रों में इड़ा( गंगा) की विपरीत दिशा में दाईं ओर समाप्त होने वाली नाड़ी को पिंगला, सूर्य या फिर जमुना नाड़ी कहते हैं।

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का रहस्य क्या है?

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि इड़ा ऋणात्मक तथा पिंगला धनात्मक नाड़ी हमारे शरीर के दो विपरीत ध्रुवों से चलने वाली जीवन शक्ति का प्रवाह मार्ग है। लेकिन सरस्वती जिसे सुषुम्ना भी कहते हैं, इड़ा और पिंगला के मध्य चलती है। इसी सुषुम्ना के मूल में कुंडलिनी उर्जा सदियों से सोई रहती है।

मणिपुर चक्र किस तत्व से बना है?

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि जिस प्रकार मूलाधार चक्र का प्रधान तत्व पृथ्वी है और स्वाधिष्ठान चक्र का प्रधान तत्व जल तत्व है,उसी प्रकार मणिपुर चक्र का प्रधान तत्व अग्नि है। जिसका बीज मंत्र ‘रं’ है। यह चक्र शरीर के अंदर की अग्नि का केंद्र है।

यह सूर्य, ऊर्जा( प्राण तत्व) , ताप, भय और जीवेषणा का केंद्र है। हमारे शरीर के अंदर जो भी पाचन, श्वसन और हमारे शरीर में पाचन और श्वसन से बनी ऊर्जा या पदार्थों का वितरण होता है, उन सबका नियंत्रण मणिपुर चक्र से ही होता है।

मणिपुर चक्र में किस देवता का वास है?

सद्गुरु कहते हैं कि चूंकि मणिपुर चक्र हमारे शरीर का पालनकर्ता है, इसलिए इस चक्र के अधिष्ठाता विष्णु हैं । यह चक्र दस कमल दल का होता है, जो विष्णु के दशावतार को प्रतीकित करता है। यहाँ विष्णु के साथ लक्ष्मी विराजमान होती हैं। इसलिए ये चक्र सांसारिक सुख सुविधाओं को प्रदान करने वाला चक्र माना जाता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि यहीं वैकुंठपुरी भी है। वरुण देवता भी यहीं वास करते हैं। क्षीर सागर भी इसी चक्र में स्थित है। यहाँ पर दस अक्षर दस कमल दल पर हैं जो इस प्रकार हैं- ण, ढ, त, थ, द, ध, न, प, और फ ।

इन दसों दलों पर भगवान विष्णु के दस पार्षद रहते हैं। शब्दकोष भी यहीं है। दस वायु भी यहीं है।

सद्गुरु कहते हैं कि मणिपुर चक्र का आधा भाग भौतिक शरीर की स्थितियों के प्रभावित रहता है तो दूसरा आधा भाग हमारे सूक्ष्म शरीर से संचालित होता है।

मणिपुर चक्र को कैसे जाग्रत किया जाता है?

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि साधक सद्गुरु के निर्देशन में अपने श्वास के सही विनियमन के द्वारा मणिपुर चक्र के अंसंतुलन से होने वाले कई प्रकार के रोगों से मुक्त हो सकता है।

शिष्य सद्गुरु के निर्देशन में अगर सही प्रकार से नाड़ी का शोधन करना सीख जाए तो सुषुम्ना में स्वतः प्रवाह शुरु हो जाता है। सद्गुरु कहते हैं कि सुषुम्ना के प्रवाह में साधक की चित्तवृत्ति का रुकना, उसकी सजगता पर निर्भर करता है। वह क्षण भर मे समाधि में जा सकता है।

सद्गुरु कहते हैं कि मणिपुर चक्र से ही वास्तव में कुंडलिनी जागरण की असली यात्रा शुरु होती है। कुंडलिनी की ऊर्जा का राजपथ यही है। सद्गुरु कहते हैं कि ये हमारे उपर निर्भर करता है कि अपने अंदर के पुर यानि नगर को शांत कर राजपथ का मार्ग प्रशस्त करें, तब कुंडलिनी स्वतः ही उपर की तरफ गमन करने लगेगी।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि सद्गुरु के निर्दैशन में जब कुंडलिनी यहाँ पहुंचती है तब सबसे पहले भगवान विष्णु लक्ष्मी सहित उसका स्वागत करते हैं। साधक को अत्यंत आनंद का अनुभव होता है।

मणिपुर चक्र में पहुंचने पर जब साधक को भगवान विष्णु और लक्ष्मी का दर्शन होता है तब साधक को भी विष्णु का पांचो उपचार, षोड़स उपचार या बत्तीस उपचार से पूजा करनी चाहिए। साधक को पहले ही ये मानसिक पूजा गुरु से सीख लेनी चाहिए।

हठयोग का मणिपुर चक्र से संबंध

सद्गुरु कहते हैं कि ह-ठ क्रमशः सूर्य और चंद्रमा यानि इड़ा और पिंगला के मध्य रमण करता है। इसे ही साधने को हठयोग कहा जाता है। सूर्य और चंद्रमा यानि इड़ा और पिंगला के मध्य ही सुषुम्ना है जिसे सरस्वती भी कहते हैं। उस सरस्वती यानि सुषुम्ना में स्नान करना ही हठयोग है।

वास्तविक हठयोग का लक्ष्य ही जबरन अपने मन पर नियंत्रण स्थापित करना है। सद्गुरु उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे उपद्रवी तत्वों पर शासक जबरन शक्ति के द्वारा जबरन नियंत्रण स्थापित करता है और तभी शांति स्थापित होती है। वैसे ही हठयोगी अपने मन पर नियंत्रण स्थापित करता है।

हठयोग में आसन का महत्व क्या है?

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि अपने मन पर नियंत्रण करने के लिए हठयोगी के लिए उचित आसन की आवश्यकता होती है जो सद्गुरु ही बता सकता है। सद्गुरु के बताए आसन पर ही स्थिर होने पर साधक शरीर का भान भूल जाता है और उसमें ऊर्जा का वर्तुल बन जाता है।

सद्गुरु अपने निर्देशन में ही आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध का अभ्यास कराता है। इनके सिद्ध होने के बाद ही सद्गुरु के निर्देशन में षट्कर्म यानि नेति, धौति, नौलि, वस्ति, कपालभाति और त्राटक का अभ्यास कराया जाता है।

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