सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तकें ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में सरल भाषा में कुंडलिनी जागरण के एक-एक चक्र को समझाया है। हमारे कुंडलिनी जागरण सीरीज़ के इस भाग में हम बात करेंगे विशुद्ध चक्र के रहस्य की।
सद्गुरु की पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में जहाँ मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र और अनाहद चक्र के प्रधान तत्वों को क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु को बताया है, वहीं सद्गुरु ने लिखा है कि विशुद्ध चक्र का प्रधान तत्व पर आकाश की प्रधानता होती है, और यहीं से साधक उत्तरायण की यात्रा प्रारंभ करता है।
दक्षिणायान की यात्रा जहाँ संसारोन्मुख यानि प्रवृत्ति मार्ग की यात्रा है जो साधक को सिद्धियों के साथ साथ संसार में फंसाती भी है, वहीं सद्गुरु के निर्देशन में जब साधक अनाहत चक्र को पार कर अद्वैत की भावना से भक्ति योग में प्रवेश करता है , तब वो अनाहत चक्र को पार कर विशुद्ध चक्र में प्रवेश करता है, जहाँ से ज्ञान योग और संन्यास की यात्रा शुरु होती है।
विशुद्ध चक्र की विशेषताएं क्या हैं?
सद्गुरु अपनी पुस्तकें ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में विशुद्ध चक्र की विशेषताएं बताते हुए लिखते हैं कि यह चक्र कंठ भाग में है। इस चक्र की अधिष्ठात्री आद्या शक्ति सरस्वती हैं। योगी लोग इसे ही हठी, देवी, परमा प्रकृति या शाकिनी भी कहते हैं। यहाँ पर पूर्ण सृदृश्य गोला यंत्र बनता है।यहीं दघि सागर भी है।
इस विशुद्ध चक्र पर सोलह कमल दल हैं। यहीं से सोलह स्वर उठते हैं जो क्रमशः दाएं से बाएं के तरफ- यथा- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ,ऋ, ऋ,लृ, ल्र,ए, ऐ, ओ, औ, अं और अः हैं।
सद्गुरु कहते हैं कि आप अपने कंधे के बायें से दायें जाती हड्डियों पर ध्यान देकर अ, आ, इ, ई स्वर का उच्चारण करके देखें तो आप पाएंगे कि बायें से क्रमशः हड्डियों पर दबाव बढ़ता जाता है।
यहाँ के देवता भारती हैं। ये 36 व्यंजनो को, जो अन्य चक्रों में हैं। 16 स्वर हैं जो हम समय भरते रहते हैं। इसे से इसे भारती देवता कहते हैं। इन 16 स्वरों में प्रत्येक से 4- 4 कला विद्या में उत्पन्न होती हैं। इस तरह 64 कला विद्या यहीं उत्पन्न होती हैं।
विशुद्ध चक्र में है सद्गुरु का निवास
कंठ से उपर तालु में 64 दल कमल हैं। जहां सद्गुरु का भी निवास होता है।
“चौंसठ दल सो उज्ज्वल वरना। तारु मध्य रहे अध हरना।
तहाँ इसे सतगुरु गोरा, अमृत खाय लिए मेह कोरा।।“
इस तरह इसे ही अमृत दल भी कहते हैं। यहां से निरंतर अमृत की वर्षा होती रहती है। साधक गुरु कृपा से अमृत का पान करता रहता है। सदगुरु शरीर छोड़ने या मृत्यु के तीन घंटा पहले इस जगह का परित्याग कर देते हैं।
अनाहत चक्र को पार करते ही क्या होता है?
इस चक्र के उपर तीन चक्र है और इसके नीचे तीन चक्र हैं। इसके नीचे ही दक्षिणायन है और इसके उपर ही उतरायण की यात्रा शुरु होती है।
सद्गुरु कहते हैं कि चूंकि इसके नीचे के तीन चक्र साधक को संसार की तरफ खींचते हैं इसलिए इस चक्र तक पहुंचने में ही सबसे ज्यादा समय लगता है। दक्षिणायन का सांसारिक गुरुत्वाकर्षण साधक को अपनी तरफ खींचता है तो इस चक्र के पार करते ही उतरायण का आकाश उसे उर्ध्वगामी बनाता है।
विशुद्ध चक्र को कैसे जागृत करें?
सद्गुरु कहते हैं कि विशुद्ध चक्र की प्रधान देवी आद्या शक्ति परमा प्रकृति हैं। इसी चक्र से देवी नीचे के सारे लोकों पर नियंत्रण करती हैं और सारे देवी देवताओं का शासन इससे नीचे ही है। विशुद्ध चक्र से उपर परमात्मा या पुरुष का क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है।
चूंकि ये माँ स्वरुप शुभ आदि शक्ति का स्थान है। इसलिए मन से ही सफेद साड़ी, चूड़ी, चादर, आसन, वसन, फूल माला इत्यादि मांग कर देवी को अर्पित करें। साधक यहाँ भी पांचों षोडसों, बत्तीसों उपचार के द्वारा देवी का पूजन करे। यहीं पर देवी का वाहन हंस भी रहता है। साधक उसका भी पूजन अर्चन करे। इसके बाद भारती देवता का भी पूजन करे।
सद्गुरु कहते हैं कि विशुद्ध चक्र पर चेतना का जो स्तर है वो हमारा मन है। मन की विशेषताएं बताते हुए सद्गुरु कहते हैं कि यह हमारे पांच तत्वों, पच्चीस प्रकृतियों, पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेंन्द्रियों पर शासन करता है। पूज्य गुरुदेव ने इन चालीसों के समूह को ही एक मन कहा है।
सद्गुरु कहते हैं कि ये तत्व, प्रकृतियाँ और इंद्रियाँ मन को सदैव खुश रखने का प्रयत्न करती हैं।यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा है कि जैसे वायु को पकड़ा नहीं जा सकता है वैसे ही मन पर पकड़ करना असंभव है।
कबीर भी कहते हैं कि –‘‘मन मन करते सुर नर मुनि जहड़े, मन के लक्ष्य द्वार।‘’
विशुद्ध चक्र है आत्म शरीर का केंद्र
यह पांचवां चक्र विशुद्ध शरीर का चक्र है। इसे ही आत्म शरीर भी कहते हैं। सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि इस शरीर की संभावनाएं अनंत हैं।जैसे साधक उपर के चक्रों में प्रवेश करते जाते हैं उसी के अनुरुप संभावनाएं भी बढ़ती जाती हैं।
वैसे प्रकृति इस चक्र का शरीर के अंदर विकास 28 से 35 वर्ष की अवस्था में कर ही देती है, लेकिन साधक इसका ठीक ढंग से उपयोग करे तो 35 वर्ष तक साधक इस शरीर को उपलब्ध हो जाता है।यह शरीर दिखाई नहीं पड़ता है जैसे आत्मा दिखाई नहीं पड़ती है, इसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है।
इस विशुद्ध शरीर ही लगभग मुक्ति का द्वार है। परंतु यहाँ तक पहुंचा साधक भी आगे नहीं जाने की इच्छा करता है। कहता है कि कि मात्र आत्मा ही है,परमात्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन, सद्गुरु की कृपा से ही वो इससे भी आगे जाकर परमात्मा से मिल सकता है।
विशुद्ध चक्र का हमारी वाणी से क्या संबंध है?
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में बताते हैं कि विशुद्ध चक्र वाणी का भी केंद्र है। चूंकि विचारों की बड़ी बड़ी तरंगे भी इसी विशुद्ध चक्र से उठती हैं, इसलिए जब भी आप ध्यान में बैठेंगे तब आपका मन विचारों का बवंडर खड़ा कर देता है।
सद्गुरु ने ऐसे ही निष्प्रयोजन उठते विचारों को प्रत्याहार कहा है जो पातंजल योग में भी वर्णित है। सद्गुरु प्रत्याहार को समझाते हुए कहते हैं कि इसका अर्थ होता है बाहर निकालना अर्थात उगलना। यह आहार का ठीक उल्टा होता है।
श्वास और शब्द के चार मार्गों का रहस्य क्या है?
सद्गुरु साधना मार्ग में श्वास को दो मार्गों से निकालने की बात कहते हैं जो नाक या मुख से निकलते हैं, लेकिन शब्द मार्गी गुरु चार मार्गों से प्रणवोच्चार कराते हैं, जिन्हें क्रमशः पिपिलिका मार्ग, मर्करी मार्ग, मान मार्ग और विहंगम मार्ग कहा जाता है।
सद्गुरु कहते हैं कि श्वास से ही ध्वनि निकलती है। ध्वनि से नाद निकलता है, नाद से ही प्राण की पहचान होती है और प्राण से ही शब्द की पहचान की जाती है।
सद्गुरु कहते हैं कि हमारे महर्षियों ने इन चारों मार्गों का सगुण नाम भी दिया है, जिन्हें सनत , सनंदन, सनातन और सनद कहते हैं। ये बालक के रुप में नंगे रहते हैं ।
पिपिलिका मार्ग क्या है?
पिपिलिका अर्थात चींटी। चींटी को उपर की तरफ चढ़ने में कठिनाई होती है। वो एक बार चढ़ती है और फिर गिर पड़ती है। इस प्रकार स्वर का आरोहण करने में वर्षों लग जाते हैं। योगी भी इसे शीघ्र नहीं कर पाते हैं। योगी अपने स्वरों की तारतम्यता बैठाते हुए चलता है।
क्या होता है मर्करी मार्ग?
मर्करी मार्ग में साधक छलांग लगा कर चढ़ता है। अपने ही लार से रास्ता बनाता है। दूसरे स्वर अर्थात बाएं से दायें स्वर में छलांग लगा जाता है। इस प्रकार की साधना से साधक सुषुम्ना में प्रवेश करने में सफल होता है।
क्या होता है साधना का मीन मार्ग?
मीन मार्गी साधक उसी प्रकार अपने साधना मार्ग पर चलते हैं जैसे कोई मीन या मछली पानी की धारा के उल्टे चलती है। साधक को इस साधना क्रम में ये भान हो जाता है कि जिस रास्ते से हम अंदर आए हैं, उसी रास्ते से यात्रा करने पर वो गोमुख पहुंच जाएंगे।
क्या होता है विहंगम मार्ग?
विहंगम मार्ग यानि आकाश का मार्ग। सद्गुरु कहते हैं कि जिस प्रकार पक्षी घोंसले में बैठा हुआ होता है और सूर्योदय होते ही आकाश में उड़ जाता है, जिसका न कोई सुनिश्चित मार्ग होता है न ही ठहराव होता है। उसी प्रकार विहंगम मार्ग का अनुसरण करने वाला साधक इस शून्य पथ पर गुरु के निर्देशन में अनंत की यात्रा करता है।
सद्गुरु कहते हैं कि विहंगम मार्ग पर गुरु की अनुकंपा के बिना चला नहीं जा सकता है। इसी मार्ग पर वेदों की ऋचाएं उतरती हैं। यहीं से दिव्य दृष्टि की प्राप्ति साधक को होती है। यहीं से आत्म शरीरी आत्माओं से साध मिलता है।
मन को रोकने की कला क्या है?
वैसे तो गीता में भगवान ने अर्जुन को कहा है कि मन बड़ा चंचल होता है और उसे रोकना बहुत ही मुश्किल कार्य है। लेकिन सद्गुरु मन को स्थिर करने की कला का ज्ञान अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में बड़ी सरलता से देते हैं।
सद्गुरु कहते हैं कि जब मन चंचल होता है तब आप उसके साथ तादात्म्य स्थापित करते हैं। जितना तादात्म्य स्थापित करेंगे, मन उसी गति से दौड़ेगा। सद्गुरु ने तादात्म्य की तुलना गाड़ी के एक्सीलेटर से की है जिसे जितना दबाएंगे गाड़ी उतनी ही तेज भागती है।
सद्गुरु कहते हैं कि आप अपने मन को तादात्म्य से हटा लें। सोंचे नहीं , मैं वासना नहीं हूँ। मन से असहयोग हो गया। सहयोग ही मन का इंजन है। असहयोग की ब्रेक है। कृष्ण कहते हैं कि इसे साक्षी होकर देखते रहो। इस मन को जब तक आप संयम में नहीं लाते प्रभु की यात्रा असंभव है।
सद्गुरु मन की गति को रोकने का एक और सरल उपाय अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में बताते हुए कहते हैं कि जैसे ही मन अशांत हो, विचारों और कल्पनाओं की लहरें इसमें उत्पन्न हो, आप कुछ न करें। सिर्फ अपने श्वास पर ध्यान केंद्रित करें। श्वास के साथ अंदर जाएँ श्वास के साथ बाहर जाएं। आप देखेंगे की चंद मिनटों में आपका मन एकदम शांत हो जाएगा।
विशुद्ध चक्र के जागने पर क्या होता है?
सद्गुरु की कृपा से जब साधक विशुद्ध चक्र को जाग्रत कर लेता है तो उसका चेहरा दिव्य आभा से भर जाता है। विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ही स्वयं उसकी जिह्वा से बोलने लगती है। मात्र साधक अपनी जिज्ञासा प्रगट करता है।
भारती देवता भी वही हैं। इसलिए साधक जिस तरह की भावना , जिस तरह का स्वरुप लाना चाहता है, वह भारती देवता तुरंत भर देता है।साधक निर्विचार होकर बोलता है। उसे जो भी देखता है वह उसकी विद्वता की प्रशंसा करता है.।
इस चक्र के जागने के बाद साधक के पास इच्छा मृत्यु की शक्ति हासिल हो जाती है। वो जितने दिनों तक जीवित रहना चाहता है , वो जीवित रह सकता है। लेकिन, साधक की आगे जीवन जीने की इच्छा ही नहीं रहती है। वह रोग और शोक से मुक्त हो जाता है।
इस शरीर में पहुंचा साधक देव योनि भी ग्रहण नहीं करता । इस स्थिति में पहुंचा साधक स्व में स्थिर होकर द्विज बन जाता है और यही द्विज आगे चल कर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है।
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