कुंडलिनी जागरण में आज्ञा चक्र का रहस्य क्या है?

कुंडलिनी जागरण सीरीज में अब हम आज्ञा चक्र की चर्चा करेंगे। आज्ञा चक्र कुंडलिनी जागरण की यात्रा का एक सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। सद्गुरु ने विशेष रुप से अपनी पुस्तकें ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में आज्ञा चक्र के जागरण में गुरु की महिमा पर प्रकाश डाला है।

सद्गुरु आज्ञा चक्र को ध्यान, धारणा और समाधि से जोड़ते हैं। आज्ञा चक्र को बिना किसी सद्गुरु की कृपा के जागृत करना असंभव है। किसी सद्गुरु के निर्देशन में ही मूलाधार चक्र से लेकर विशुद्ध चक्र की यात्रा की जा सकती है।

 इसके बाद सद्गुरु ही शिष्य की योग्यता देख कर उसका आज्ञा चक्र जागृत कर उसे वास्तविक ध्यान, धारणा और समाधि से अवगत कराता है। इसलिए सद्गुरु इस चक्र को गुरु अनुकम्पा का क्षेत्र कहते हैं।

आज्ञा चक्र की विशेषताएं क्या हैं?

कुंडलिनी जागरण के सीरीज 1 से 5 तक सद्गुरु ने मूलाधार चक्र से लेकर विशुद्ध चक्र के प्रधान तत्वों के बारे में बताया है। जहां मूलाधार चक्र का प्रधान तत्व पृथ्वी, स्वाधिष्ठान चक्र का जल, मणिपुर चक्र का अग्नि, अनाहत चक्र का वायु और विशुद्ध चक्र का प्रधान तत्व आकाश है, वहीं आज्ञा चक्र में इन पंच तत्वों की प्रधानता समाप्त हो जाती है।

सद्गुरु कहते हैं कि आज्ञा चक्र उत्तरायण का मध्य है। उत्तरायण की यात्रा अनाहत चक्र से शुरु होती है और आज्ञा चक्र तक अपने मध्य तक पहुंचते हुए सहस्त्रार चक्र तक पहुंचती है। सद्गुरु कहते हैं कि कुंडलिनी जागरण की यात्रा में ये छठा चक्र है और ये दोनों भौहों के बीच भृकुटी के मध्य में स्थित है।

 आज्ञा चक्र में दो कमल दल हैं। यह बिल्कुल शुभ्र रंग की है। इसे जीव विज्ञान की भाषा में पीनियल ग्लैंड भी कहा जाता है। यह सामने मस्तिष्क में दो माँस पिण्ड की तरह है, जो साधक के द्वारा करने से ऊर्ध मुख होकर खिल जाते हैं। इसे ही त्रिनेत्र भी कहा जाता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में कहते हैं कि आज्ञा चक्र ही गायत्री मंत्र का ‘धीमहि धियो योनः’ का भी यही स्थान है। सद्गुरु कहते हैं कि यही ज्योति पुरुष का भी क्षेत्र है और इसे ही दशम द्वार भी कहा गया है। यही आत्मा का क्षेत्र भी माना जाता है।

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज़ ने अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखा है कि आज्ञा चक्र के दोनों कमल दलों या कहें तो पीनियल ग्लैंड के दोनों माँस पिण्डों पर ही डाकिनी और शाकिनी शक्तियाँ रहती हैं।

आज्ञा चक्र के दोनों कमल दलों पर दो अक्षर हं और क्षं अंकित हैं। इसमें थोड़ा सा उपर एक सतदल डाकिनी कमल है। यह कमल दल भी श्वेत है। इसे प्रकृति का महल या माया महल कहते हैं।

आज्ञा चक्र ही तप लोक है जहाँ ऊँ का प्रणव भी हर समय सुनाई पड़ता है।यहाँ लिंगाकार मंत्र बनता है जिसे साधक निर्गुण शिव भी समझते हैं। शंकर और शिव में यहाँ अंतर है। शंकर की आकृति है मानव की तरह लेकिन शिव प्रकाश स्वरुप लिंगाकार हैं।

सद्गुरु कबीर साहेब इसी आज्ञा चक्र को त्रिवेणी संगम भी कहते हैं-

“त्रिवेणी संगम झलके हीरा।

चरण चित तह रख,कबीरा।।“

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी आज्ञा चक्र की महिमा का बखान करते हुए कहा है कि –

“परम प्रकाश जलै दिन राती।

न चहौ दीप घृतबाती।।“

निर्गुण निराकार शिव की स्थिति यही है। इसी से शैव साधक अपने ललाट पर पिण्डी बनाते हैं।ये यहीं पर आनंदित रह कर जन्मो जन्मों पड़े रहते है। उनके लिए यही स्थान सर्वोच्च है।

आज्ञा चक्र ही है ध्यान, धारणा और समाधि की त्रिवेणी

सद्गुरु कहते हैं कि आज्ञा चक्र से ही ध्यान, धारणा और समाधि की अवस्थाएं प्राप्त की जाती हैं। चूंकि ये गुरु अनुकंपा का क्षेत्र है इसलिए यहाँ अपना कोई भी बस नहीं चलता है। सद्गुरु कहते हैं कि बिना गुरु की अनुकंपा के इस चक्र तक कोई भी नहीं पहुंच सकता है।

सद्गुरु ने अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखा है कि आज्ञा चक्र से दो अंगुल उपर गुरु पर्वत है। इसे ही सद्गुरु ने गुरुद्वार कहा है और नानक ने भी इसे गुरुद्वार की ही संज्ञा दी है। यहाँ कोई दीवार नहीं है सिर्फ द्वार है परमात्मा तक पहुंचने के लिए। इसी द्वार से साधक की आत्मारुपी दुल्हन परमात्मा रुपी दुल्हा से मिलने आती है।

आज्ञा चक्र को जागृत कैसे करें?

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि सद्गुरु का आदेश प्राप्त कर और उनके निर्देशन में साधक आज्ञा चक्र मे वास करने वाली हाकिनी और शाकिनी की पूजा मानसिक रुप से कर सकता है।

लेकिन सद्गुरु कहते हैं कि आज्ञा चक्र पर ध्यान लग जाने से न अलग पूजक बचता है और न ही पूज्य। यहाँ एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो जाती है। त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से जन्मों का पाप स्वाहा हो जाता है। संस्कार स्वतः समाप्त हो जाता है।

सद्गुरु कहते हैं कि आज्ञा चक्र रुपी त्रिवेणी में गंगा, जमुना और सरस्वती अर्थात इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का दिव्य संगम हो जाता है।इसे ही योगियों ने वास्तविक प्रयागराज कहा है। सद्गुरु कहते हैं कि वैसे तो भौतिक मानव शरीर का ह्द्य हमारी छाती की बायीं तरफ रहता है जहाँ से रक्त का संचार पूरे शरीर में होता रहता है लेकिन योगियों का वास्तविक आध्यात्मिक ह्दय आज्ञा चक्र ही है जहाँ से प्रकाश सारे चक्रों से आता है।

आज्ञा चक्र को जागृत करने की विधि

सद्गुरु ने अपनी पुस्तक लोक-परलोक’ में आज्ञा चक्र को जागृत करने की सरल विधि भी बताई है। सद्गुरु कहते हैं कि अपने गुरु का ध्यान करें । उनकी एक मूर्ति या तस्वीर अपने सामने रखें।

आप गुरु की तस्वीर पर उनके आज्ञा चक्र को देखें जो दोनों ही नेत्रों के बीच भृकुटी पर स्थित है। आप जैसे ही गुरु के आज्ञा चक्र पर ध्यान करते हैं तो गुरु के आज्ञा चक्र से निकलने वाली ऊर्जा आपके आज्ञा चक्र की तरफ लौट कर आपको धक्का देती है जिससे आपका आज्ञा चक्र निरंतर अभ्यास के बाद खुल जाता है।

गुरु के आज्ञा चक्र से जो ज्योतिपुंज निकलता है वो आपके आज्ञा चक्र के चारो तरफ के मलावरण यानि जन्म जन्म से जमें पुण्यापुण्य संस्कार को जला कर भस्म कर देता है जिससे उसका कपाट स्वतः ही खुल जाता है।

जैसे ही आपके आज्ञा चक्र का दरवाजा खुलता है ,उसके दो अंगुल उपर स्थित गुरु पर्वत पर बैठे आपके परमात्म गुरु आपका स्वागत करते हैं और परमात्मा से मिलने का द्वार दे देते हैं।

आज्ञा चक्र के जागरण में गुरु का महत्व

सद्गुरु अपनी पुस्तक लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि इस चक्र पर पहुंचते ही साधक को परमात्मा से मिलने की जल्दबाजी हो जाती है और परमात्मा भी आत्मा से मिलने के लिए आतुर हो जाता है।

 लेकिन गुरु साधक के धैर्य और योग्यता की परीक्षा लेता है और परमात्मा को भी कुछ देर के लिए रोक देता है। साधक जैसे ही साधना रुपी अग्नि में जलकर अपना कलुष खोता है , गुरु अपने अनुग्रह रुपी जल से साधक रुपी घड़े को धो देता है।

गुरु अपने साधक की जांच करता है कि कहीं उसकी साधना कच्ची तो नहीं रह गई है? कहीं उसके अंदर किसी कामना का कोई छिद्र तो नहीं रह गया है? जब गुरु पूर्णरुप से आश्वस्त हो जाता है कि साधक रुपी पात्र के अंदर परमात्मा से मिलन की पात्रता आ चुकी है, फिर गुरु स्वयं को गुरुद्वार में बदल देता है और साधक का परमात्मा से मिलन करा देता है।

सद्गुरु की इसी महिमा का गान तुलसी से लेकर कबीर तक ने किया है। सद्गुरु कहते हैं कि आप तप से ब्रह्मा या शिव तो हो सकते हैं लेकिन मुक्ति नहीं पा सकते हैं। तुलसी स्वयं गुरु की महिमा बताते हुए कहते हैं कि “गुरु बिन भवनिधि तरै न कोई । विरंचि शंकर सम जो होई।“

साधना पथ में गुरु की आवश्यकता तो साक्षात विष्णु के अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी हुई थी। तभी तो कबीर कहते हैं कि “राम कृष्ण से को बड़ा। वो भी तो गुरु कीन्ह। तीन लोक के वे धनी , गुरु के आगे अधीन।।“

आज्ञा चक्र के जागरण में गुरु का महत्व

आज्ञा चक्र के दो अंगुल उपर होता है गुरु पर्वत। इस पर्वत पर ही गुरु सदैव श्वेतांबरी रुप में विराजमान रहते हैं। जो साधाक गुरु के साकार रुप का ध्यान करता रहता है, वह एक दिन इस आज्ञा चक्र रुपी हवाई अड्डे पर जरुर पहुंच जाता है। फिर गुरु अनुकंपा रुपी जहाज पर सवार हो जाता है।

ऐसे साधक को गुरु पर्वत स्वतः अपनी तरफ खींच लेता है। तब वह पर्वत ही एकाएक प्रकाश स्वरुप गुरुद्वार बन जाता है। यह द्वार ही गुरुद्वार है जिससे होकर साधक परम पुरुष की तरफ उन्मुख हो जाता है।

गुरु पर्वत के गुरु द्वार के रुप में रुपांतरित होना गुरु अनुकंपा का ही परिणाम होता है। इसे हम तप या हठ के द्वारा प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसी लिए कहा गया है कि –

“गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांव।

बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताए।।“

आज्ञा चक्र पर लगने वाली विशेष समाधि- संप्रज्ञात समाधि क्या है?

आज्ञा चक्र पर साधक संप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध हो जाता है। वह इस इस विशेष समाधि की अवस्था में ब्रह्ममय सृष्टि को देखने लगता है। अब प्रश्न उठता है कि फिर जीवात्मा कहाँ है? उसका ब्रह्म से क्या संबंध है?

सामान्य शरीर में आत्मा शरीर के ह्दय भाग में वास करती है। जब व्यक्ति स्वप्नावस्था में रहता है तब जीवात्मा का स्थान कंठ होता है। जाग्रत अवस्था में आत्मा हमारे नेत्रों में रहती है, लेकिन संप्रज्ञात समाधि की अवस्था में जीवात्मा ब्रह्मस्वरुप होकर यहीं स्थित रहती है।

आज्ञा चक्र जागृत होने के फायदे

जैसे ही सद्गुरु कृपा से आपका आज्ञा चक्र जागृत होता है आपकी इच्छाओं के अनुसार सारे कार्य होने लगते हैं। प्रकृति आपकी सहचरी बन जाती है। ऋद्धियाँ और सिद्धियां आपके आस पास डेरा डाल देती हैं। आपका रजोगुण तमोगुण समतुल्य हो जाता है और सतोगुण शीर्ष पर खड़ा हो जाता है।

आज्ञा चक्र के जाग्रत होते ही साधक परम प्रकाश में स्व को लीन कर लेता है और तब उसकी दिव्य दृष्टि अपने आप ही आ जाती है। इसे ही त्रिनेत्र या शिव नेत्र भी कहते हैं। आज्ञा चक्र के जागृत होते ही यह शिव नेत्र साधक को अपने आप ही प्राप्त हो जाती है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि चूंकि शिव लिंग स्वरुपी त्रिनेत्र आज्ञा चक्र पर ही है,इसलिए साधक को यहीं पर चंदन लगाना चाहिए।चंदन साधक की साधना को और भी प्रशस्त बनाता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक कुंडलिनी जागरण में लिखते हैं कि साधक का प्राण और मन जैसे ही आज्ञा चक्र पर रुक जाता है , वह तत्क्षण संप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध हो जाता है। सहज योग के साधक की यात्रा भी यहीं से शुरु होती है।

आज्ञा चक्र के जागरण के साथ ही साधक को ब्रह्म शरीर की प्राप्ति हो जाती है।इस शरीर में पहुंच कर ही साधक को अह्म ब्रह्मास्मि का बोध होता है क्योंकि वो इसी शरीर में अपने स्व को खो देता है। अब साधक को ये अनुभव हो जाता है कि ब्रह्म ही सत्य है। अब साधक अनंत हो जाता है।

इस ब्रह्म शरीर को प्राप्त करने के बाद साधक अपनी इच्छा अनुसार शरीर ग्रहण कर लेता है।यदि वह चाहता है कि इस शरीर को छोड़ कर कहीं और ब्रह्म शरीर ग्रहण कर आनंदपूर्वक रहूं तो रह सकता है। जैसे अभी भी हिमालय में हजारों साधक इसी ब्रह्म शरीर के साथ हजारों वर्षों से रह रहे हैं।

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