कुंडलिनी जागरण का सर्वोच्च शिखर – सहस्त्रार चक्र का रहस्य

कुंडलिनी जागरण का सर्वोच्च शिखर – सहस्त्रार चक्र का रहस्य

पूज्य सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तकों ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में कुंडलिनी जागरण के एक-एक चक्रों का गहराई से विश्लेषण किया है। पूज्य स्वामी जी ने सनातन धर्म के राजयोग की इस रहस्यमयी परंपरा को पहली बार सामान्य साधकों के लिए खोला है। इसी क्रम में अब हम कुंडलिनी जागरण के सर्वोच्च शिखर यानि सहस्त्रार चक्र का भेद खोलेंगे।

सहस्त्रार चक्र का रहस्य क्या है?

यह सातवां चक्र है। यहाँ पर परब्रह्म परमात्मा का स्थान है। यह हजार कमल दल वाला चक्र है। यह दल अनंत सूर्यों से प्रकाशित है। यह पूर्ण चंद्र की तरह प्रतीत होता है। इसका स्थान तालु से ऊपर मस्तिष्क में है।

अब सह्स्त्रार चक्र से देवताओं के भी देवता परब्रह्म परमात्मा स्वयं विराजमान हैं। इसे ही सत्य लोक भी कहा जाता है। यहाँ तो ‘अ’ स्वर से ‘क्ष’ व्यंजन तक सब यही हैं। यहाँ पूजक एवं पूज्य दोनों एक हो जाते हैं। साध्य और साधक एक हो जाते हैं। बूंद समुद्र में समा जाता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक कुंडलीनि जागरण में लिखते हैं कि जिस प्रकार आज्ञा चक्र के जाग्रत होने पर संप्रज्ञात समाधि लगती है , उसी प्रकार सहस्त्रार चक्र के जाग्रत होने पर साधक को असंप्रज्ञात समाधि लग जाती है। इस समाधि में शरीर का भान भी समाप्त हो जाता है।

सहस्त्रार चक्र – निर्गुण निराकार में विलीन होने का चक्र

यहाँ पर 24 घंटे 21600  जाप अपने आप होता रहता है, परंतु इस अवस्था में साधक जाप से भी ऊपर उठ जाता है। चूंकि यही ब्रह्मांड है, यहीं से नीचे के सारे पिण्डों की सृष्टि होती है, इसलिए यहीं से सबका नियंत्रण भी होता है। अक्षर का नियंत्रण भी यहीं से होता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक कुंडलिनी जागरण में लिखते हैं कि निराकार निर्गुण ब्रह्म भी यहीं है। अतः तुरीयातीत अवस्था को साधक उपलब्ध हो जाता है। सद्गुरु कहते हैं कि यहाँ अनहद की गति नहीं है। यही परम शुद्ध चित्त आनंद है। यहाँ बिल्कुल शुद्ध सतोगुण है। योगी यहाँ पूर्ण- सतोगुण में कल्पों तक निवास करता है।

सहस्त्रार चक्र से परे क्या है? क्या है महंत पद्म का रहस्य?

सहस्त्रार चक्र से दो अंगुल आगे महंत पद्म है। साधारण साधक इसे सहस्त्रार में ही गिनते हैं या देखते हैं। चूंकि अब यहाँ वर्णन करना बिल्कुल असंभव है। यह अनंत दल है। अनंत रवि का तेज है। इसी से सद्गुरु कबीर साहेब कहते हैं –

“सोई घर चेतहू हो भाई, जो आवा गमन मिटाई।

लक्ष्मी वा घर झाड़ू देत है, शिव फेके कतवार।।

विष्णु पहरा दार , सो घर चेतहू हो भाई।।“

सहस्त्रार चक्र में साधक को मिलता है कैसा शरीर?

इस चक्र में साधक निर्वाण शरीर को प्राप्त कर लेता है। यहाँ एक अनहोनी घटना घटती है। अभी तक अस्तित्व बीइंग का बोध हो रहा था, अब नहीं होने का बोध होने लगता है। जब नहीं होने का पता चल जाता ह , यही परम सत्य है। इसे ही कुंडलिनी जागरण में महामृत्यु कहा गया है। इसी महामृत्यु पर ब्रह्मा की सत्यता का साक्षात्कार होता है।

साधक को आज्ञा चक्र में प्राप्त ब्रह्म शरीर में कुछ जानने को शेष रह गया था लेकिन निर्वाण शरीर में न जानने का , न होने का और मिट जाने की घटना घटती है। सद्गुरु कहते हैं कि बुद्ध इसी स्थिति को कहते थे – जैसे दीपक जल रहा हो, उसको समझ जाना।

इस शरीर में छलांग लगाने के लिए यानि अस्मिता से अस्तित्व से अनस्तित्व में चले जाना है। अब ये साधक का नहीं, सीढ़ी के रूप में साधक को मदद करेंगे।

सहस्त्रार चक्र में जाने के बाद प्राप्त सातवें शरीर के व्यक्ति से प्रकृति में कोई रहस्य बाकी नहीं रह जाता है।वह परम शून्य हो जाता है। शून्य से शून्य में गति अपने आप ही हो जाती है।

यदि कोई भी साधक पूर्ण रुप से इस शरीर में पहुंचे व्यक्ति के सामने अपने को समर्पण कर दे, तो फिर देंखे तुरंत शक्तिपात हो जाता है। अब दो परम शून्य एक हो जाते हैं। सातवाँ शरीर जीवन और मृत्यु दोनों के पार का है।

चूंकि जीवन यदि पहला भौतिक शरीर है तो मृत्यु सातवें शरीर की शुरुआत है। यह शरीर दोनों के पार हो जाता है। इसलिए इसे महामृत्यु कहा गया है। इस शरीर को प्राप्त योगी अपने आप में सदा आनंदित रहते हैं। सारी वासनाएं क्षीण हो जाती हैं। 

आप सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी की पुस्तकें ‘कुंडलिनी जागरण’ एवं ‘लोक-परलोक’ इस पते पर संपर्क कर मंगा सकते है

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