सच्चे गुरु की खोज कैसे करें
आज संसार में विशेषकर सनातनधर्मी भारतवर्ष में लगभग प्रत्येक गली कूचे में तथाकथित गुरुओं की भरमार हो गई है। ऐसे में सच्चे गुरु की खोज वास्तव…
एक ऐसी ध्वनि होती है जो उत्पन्न नहीं की जाती, स्वतः गूंजती रहती है। इसे स्थूल कानों से नहीं सुना जा सकता। ये ध्वनि ब्रह्मांड में हर समय गूंजती रहती है। इसके अनुभव के लिए हमारे ऋषियों ने अनेक अनुसंधान किए। वे गुफाओं में बैठकर प्रयोग कर यह जानने की कोशिश करते रहे कि आखिर ये ध्वनि सुनने में कैसी लगती है। क्या हम इसे बोल सकते हैं? अपने भीतर यह अनुसंधान किया तब पाया कि भीतर भी वही ध्वनि गूंज रही है। उसे बोलने की कोशिश की गई तो पाया कि अ उ म को मिश्रित करके जब ॐ बोला जाता है तो काफी हद तक उस ब्रह्मांडीय गूंज जैसी ये आवाज होती है।
ओंकार ध्वनि से प्रस्फुटित होने वाला ब्रह्म इतना सशक्त और सर्वशक्तिमान् है कि वह सृष्टि के किसी भी कण को स्थिर नहीं होने देता। समुद्रों को मथ डालने से लेकर भयंकर आँधी तूफान और ज्वालामुखी पैदा करने तक-परस्पर विचार विनिमय की व्यवस्था ले लेकर ग्रह-नक्षत्रों के सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने तक एक सुविस्तृत विज्ञान किसी समय भारतवर्ष में प्रचलित था। नाद-ब्रह्म की उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत क्षमताओं के अधिपति और स्वर्ग सम्पदा के अधिकारी देव मानव कहलाते रहे है।
अनहद मन को केंद्रित करने का सर्वोत्तम उपाय है। इस साधना के माध्यम से कोई भी साधक अपने काम में अटकता नहीं है |
अनहद योग साधना व्यक्ति को जीतेजी मुक्त कर देती है |
इस साधना से गुप्त मानसिक शक्तियां विकसित होती है, जिससे भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दिशाओं में विकास होता है |
सेक्रेड सांइस को लेकर विज्ञान का मानना है कि हमारे शरीर के संस्थान 7 ग्रंथियों से जुड़े हैं, ये सभी ग्रंथियां मटर के दाने के बराबर होती हैं, जो हमारे शरीर से सात चक्रों से जुड़ी रहती है । जब हम ध्यान करते हैं तो हमारी बिखरी ऊर्जा एकत्रित होने लगती है फिर एकत्रित होकर ऊपर की ओर जाने लगती है। ऊर्जा को एकत्रित करने के लिए शरीर का स्थिर होना जरूरी है ताकि विचारों की लहरों को स्थिर किया जा सके। इसके लिए हम आसन और प्राणायाम का सहारा लेते हैं ताकि ध्यान साधना के दौरान हम अपने मन को निष्क्रिय करने में सफल हो सकें । दोस्तों जैसे ही हम विचारहीन हो जाते हैं वैसे ही हमारे मन में पुराने संस्कार और कर्म बंधन टूटने लगते हैं, हम आत्म प्रकाश में स्थित हो जाते हैं। मन के दैविक गुण जैसे धैर्य, सन्तोष, सहिष्णुता व प्रेम जाग जाते हैं और इस संसार में ही स्वर्ग दिखने लगता है । अपने शरीर की 7 ग्रंथियों के माध्यम से सात चक्रों को जागृत कर हर परिस्थिति में आनन्द और सुखमय रहना ही दिव्य गुप्त विज्ञान की परिभाषा है।
इस विद्या का एक रहस्य गुरुत्व भी है अर्थात जैसे ही शिष्य को पूर्ण शिष्य बनना है तो गुरु स्वयं उस विद्यार्थी में खुद को समाहित कर लेगा जैसे गुरु नानक देव, अंगद देव में प्रवाहित हुए थे वैसे ही यह विद्या भी गुरु शिष्य के माध्यम से निरंतर प्रवाहित होती रहती है। यह एक ऐसी विद्या है जिसका पूर्णत : प्रयोग ऋषि मुनियों ने ही किया क्योंकि देव संस्कृति बिना पात्रता का विचार किए ही अपने शिष्यों का वरदान देते आए हैं इसलिए राक्षस और देव संस्कृति में इसका पूर्ण सदुपयोग नहीं हुआ है। जैसे भगवान शंकर ने शीघ्र ही प्रसन्न होकर भस्मासुर को वरदान दिया अर्थात् गुप्त विज्ञान प्रदान किया वह कामासक्त होकर अपने गुरु यानी भगवान शिव की पत्नी पार्वती पर मोहित हो गया और उन्हें पाने के लिए भगवान शंकर को ही भस्म करना चाहा अंत में शंकर जी को भागना पड़ा लेकिन भगवान विष्णु ने इसी विद्या के सहारे मोहिनी रूप ग्रहण किया फिर भस्मासुर को उसी विद्या से भस्म किया।
सद्गुरु से दीक्षा लेने के बाद मुझे ऐसा लगा कि, इस समय यदि भगवान बुद्ध के समान कोई दीक्षा दे सकता है तो वो स्वामी कृष्णानंद जी महाराज के अलावा दूसरा कोई नहीं है
डॉ. सुप्रीति AIIMS DELHI
मेरी ज़िंदगी लंबे समय तक एक भटके हुए मुसाफ़िर की तरह थी – उद्देश्यहीन, उलझनों से भरी और भीतर एक खालीपन का एहसास लिए हुए।
दिनेश कुमार सिंह WIN MEDICAREआज संसार में विशेषकर सनातनधर्मी भारतवर्ष में लगभग प्रत्येक गली कूचे में तथाकथित गुरुओं की भरमार हो गई है। ऐसे में सच्चे गुरु की खोज वास्तव…
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सद्गुरु की दीक्षा लेने के बाद मैं उस मुकाम पर पहुंच गया जिसे मैं पाना चाहता था, इसके अलावा उनके पास इतनी शक्ति है कि वे हिंसक जीव को भी अपने वश में कर सकते है
ठाकुर नारायण तिवारी ASI (यूपी पुलिस)