सुंदरता क्या वास्तव में वही है जो आँखें देखती हैं? यदि आज हम किसी व्यक्ति से “सुंदरता” की परिभाषा पूछें, तो उत्तर लगभग एक जैसा होगा — साफ रंग, आकर्षक चेहरा, सुडौल शरीर और मनमोहक व्यक्तित्व। समाज ने सुंदरता को केवल बाहरी रूप तक सीमित कर दिया है।
परंतु क्या वास्तव में सुंदरता केवल शरीर का विषय है? या फिर सुंदरता मन, भावना और चेतना की एक आंतरिक अवस्था है? सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज अपनी पुस्तक “हनुमान चालीसा भाष्य” के अध्याय “सुंदर एवं कुरूप” में इसी गहन सत्य को अत्यंत सरल शब्दों में उजागर करते हैं। यह अध्याय न केवल हनुमानजी के स्वरूप को समझाता है, बल्कि हमारे सोचने की दिशा को भी परिवर्तित करता है।
कंचन-वरण का रहस्य
तुलसीदासजी हनुमान चालीसा में लिखते हैं,कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा॥ सामान्य दृष्टि से देखें तो यह श्लोक किसी सुंदर राजकुमार के वर्णन जैसा प्रतीत होता है। परंतु सवाल उठता है,हनुमानजी तो वानर रूप में जन्मे थे, फिर तुलसीदासजी उन्हें “कंचन-वरण” अर्थात स्वर्ण-सा तेजस्वी क्यों कहते हैं? स्वामी कृष्णानंद जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि यह वर्णन शरीर का नहीं, आत्मिक तेज का है।जब साधक का मन भक्ति, प्रेम और समर्पण से भर जाता है, तो उसकी चेतना स्वर्णिम हो जाती है — और वही स्वर्णिम चेतना उसे हर स्थान पर सुंदरता का अनुभव कराती है।
सुंदरता दृष्टि में होती है
हनुमानजी का रूप साधारण था,परंतु उनके भीतर जो गुण थे,भक्ति, शक्ति, विनय, बुद्धि, करुणा और तेज, वे उन्हें अद्वितीय बना देते हैं। तुलसीदासजी की आँखों में हनुमानजी सुंदर इसलिए दिखते हैं क्योंकि दृष्टा का हृदय सुंदर है। ठीक वैसे ही जैसे मजनूं की आँखों में लैला सबसे सुंदर थी, भले ही संसार की दृष्टि में वह साधारण हो। क्योंकि सुंदरता देखने वाले की चेतना में जन्म लेती है।
गुण ही सच्ची शोभा हैं
स्वामी कृष्णानंद जी महाराज कहते हैं,तुलसीदासजी पहले गुणों का वर्णन करते हैं, फिर रूप का। क्योंकि गुण ही रूप की वास्तविक शोभा हैं।इतिहास में अनेक उदाहरण हैं,चाणक्य जी रूप से सुंदर नहीं थे, परंतु बुद्धि से अद्वितीय थे। सूरदास जी नेत्रहीन थे, परंतु उनकी काव्य-दृष्टि दिव्य थी। तिरुवल्लुवर साधारण दिखते थे,परंतु उनका ज्ञान अमूल्य था। इसी प्रकार हनुमानजी का शरीर साधारण था, परंतु उनके भीतर दिव्यता का महासागर था।
कुंचित केश और कुण्डल का अर्थ
कई लोग पूछते हैं,क्या किसी वानर के कानों में कुण्डल हो सकते हैं? स्वामी कृष्णानंद जी महाराज बताते हैं कि ,यह वानर शरीर का नहीं,वानर वंश की संस्कृति का संकेत है। हनुमानजी वनवासी कुल में जन्मे दिव्य पुरुष थे, राजकुमारों की भांति घुंघराले केश और अलंकरण उनकी तेजस्विता के प्रतीक हैं। जब साधना गहराती है, तो साधक के भीतर से एक दिव्य तेज प्रकट होता है,इसे ही शास्त्रों में आभा कहा गया है। आपने महापुरुषों के चित्रों में चेहरे पर हल्की सुनहरी चमक अवश्य देखी होगी। वह शरीर की सुंदरता नहीं,आत्मिक तेज होता है। तुलसीदासजी उसी तेज को देख रहे थे इसीलिए हनुमानजी उन्हें “कंचन-वरण” प्रतीत होते हैं।
जीवन का संदेश
यह अध्याय हमें सिखाता है कि सुंदरता शरीर में नहीं रहती, सुंदरता तुम्हारी दृष्टि में रहती है। सुंदरता और कुरूपता शरीर के विषय नहीं, मन की अवस्थाएँ हैं। रूप समय के साथ नष्ट हो जाता है,परंतु गुण अमर रहते हैं। हनुमानजी सुंदर इसलिए हैं क्योंकि उनका हृदय भक्ति से परिपूर्ण है
और देखने वाला हृदय भी निर्मल है। यह अध्याय केवल हनुमानजी के स्वरूप का वर्णन नहीं करता, यह मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान से परिचित कराता है। यदि आपके गुण सुंदर हैं, आपकी भक्ति सुंदर है,आपकी विनम्रता सुंदर है, तो संसार आपको सुंदर ही देखेगा।यही इस अध्याय का शाश्वत संदेश है। यदि आप हनुमानजी को समझना ही नहीं, अपने जीवन में उतारना चाहते हैं, तो यह अध्याय अवश्य पढ़ें।