क्या सच में जीवन का अंतिम सत्य है मुत्यु ?

मृत्यु को जीवन का अंतिम सत्य कहा गया है। उसको लेकर हमारे समाज के अधिकतर लोग खौफ में रहते हैं। ये डर इस हद तक हावी रहता है कि लोग इसे बिना समझे ही इसकी कल्पना करने लगते हैं। कुछ दार्शनिक मृत्यु और जीवन के बीच तुलना करते हुए मृत्यु को दर्दनाक सच बताते हैं तो जीवन को एक सुंदर झूठ के रूप में देखते हैं। हालांकि नाथ संप्रदाय के योगी और संत पुरुषों में से एक गुरु गोरखनाथ मृत्यु को अंतिम सत्य के नजरिए से नहीं बल्कि अंतिम झूठ के नजरिए से देखते हैं।

मृत्यु को लेकर क्या कहते हैं गुरु गोरखनाथ ?

मरौ वे जोगी मरौ, मरौ मरन है मीठा।
तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरख मरि दीठा।

अर्थात् जो आत्मा और शरीर के योग को देख लिया है। वही मृत्यु को भी देख सकता है। क्योंकि इस संसार में मृत्यु से बड़ा सत्य कुछ नहीं है। हालांकि यह सत्य उन लोगों को बड़ा लगता है जो इसके डर के साए में जीते हैं। जो इंसान इसकी वास्तिवकता को समझ लेता है। उसके लिए मृत्यु सच के समान नहीं बल्कि सबसे बड़ा झूठ बन जाती है।

असल में, जैसे ही कोई बच्चा जन्म लेता है। वैसे ही उसकी उम्र घटनी शुरू हो जाती है। क्योंकि वह हर रोज मृत्यु के समीप पहुंच रहा होता है। उसे अधिकतर ऐसे लोग लंबी उम्र की दुहाई देते हैं। जो मृत्यु से अनभिज्ञ होते हैं। हालांकि एक योगी समान पुरुष मौत को नजदीक से देख लेता है और वह समझ लेता है कि जब मृत्यु शास्वत सत्य है तो फिर उसके साथ हमें क्यों जीना जब उसे एक न एक दिन आनी ही है। बेहतर होगा कि हम इस मृत्यु को खुद के लिए झूठा बता दे और जीवन को सत्य मानते हुए उसके साथ जीना शुरू कर दे।  

मुत्यु को लेकर पुस्तक शिव नेत्र में क्या लिखा गया है ?

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज स्वर्गवास को लेकर गुरु गोरखनाथ की बातों का जिक्र करते हुए अपनी पुस्तक शिव नेत्र में लिखते हैं कि- “हम अपने जीवन को सत्य तभी बता सकते हैं। जब मौत को ये मान ले कि मृत्यु तो है ही नहीं जीवन ही सत्य है। मृत्यु असत्य है। हालांकि ये तभी संभव हो पाता है जब कोई इंसान साधना में लीन होकर समाधि में प्रवेश कर जाता है, वह मौत का साक्षात्कार कर लेता है और फिर समझ जाता है कि इस शरीर में जब तक आत्मा निवास करती है, तब तक जीवन है। आत्मा निकलने का मतलब जीवन का खत्म होना नहीं बल्कि शरीर का समाप्त होना है। जैसे आपने इस जीवन में कितने वस्त्र बदले यह याद नहीं है और न ही वस्त्र बदलने का आपको दुख है। ऐसे ही समाधि धारण करना वाला व्यक्ति अपनी आत्मा को इस शरीर से आनन्द पूर्वक निकाल लेता है और वह अपने झूठे जीवन को सत्य के मार्ग पर ला देता है”

आत्मा अमर और शाश्वत है

जैसा कि हम जानते हैं कि आत्मा अमर और शाश्वत है। फिर जीवन को हम अधूरा कैसे मान सकते। क्योंकि शरीर और आत्मा के बीच अटूट रिश्ता होता है जिसके मिलन का परिणाम जीवन होता है। चाहे एक पार्थिव शरीर का जीवन हो या सूक्ष्म, या मनोमय शरीर का। हालांकि शरीरों के कई प्रकार होते हैं और सभी में जीवन होता है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात मृत्यु हमारे जीवन को ऊर्जा प्रदान करती है। क्योंकि किसी भी इंसान की मौत के बाद आत्मा उसके शरीर को छोड़कर नए जीवन की तलाश में निकलती है। और नए शरीर में ऊर्जा भर देती है। वहीं आत्मा का सम्बन्ध इस जगत से स्थूल शरीर, भाव शरीर, सूक्ष्म शरीर, मनोमय शरीर से हैं। ये चार शरीर किसी न किसी प्रकार इस संसार से जुड़े हुए हैं।

मृत्यु को लेकर क्या कहते हैं सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ?

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंदी जी महाराज कहते हैं कि- “महात्मा बुद्ध ने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु से मुक्ति के लिए संसार त्याग दिया था, हालांकि व्यक्ति हर स्थिति से समझौता कर जीना चाहता है। जबकि उसकी कामना केवल स्वस्थ, सार्थक जीवन के साथ उद्देश्य की पूर्ति में होनी चाहिए। इसलिए जो इंसान अपने जीवन के उद्देश्य को समझते हुए जिंदगी जीना शुरू कर देता है। उसके लिए जीवन एक सत्य के समान और मृत्यु झूठ बराबर दिखने लगती है…’