क्या सच में आत्मा अमर है ?

ये एनं वेत्ति हंतारं, यश्चैनं मन्यते हतम्
उभौ तौ न विजानीतो, नायं हन्ति न हन्यते

अर्थात जो इस आत्मा को मारनेवाला समझता है और जो इसको मरा हुआ मानता है। वे ये नहीं जानते कि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न कोई इंसान इसको मार सकता है।

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज अपनी किताब ‘गीता ज्ञान मंदाकिनी’ में लिखते हैं कि  भगवान कृष्ण इन पंक्तियों के जरिए अर्जुन से उच्चत्तम दर्शन, उच्चत्तम फिलॉसफी की बात कर रहे हैं। दरअसल, रणभूमि में कौरवो की तरफ से खड़े गुरु द्रोण और भीष्म जैसे वीर पुरुषों को देख अर्जुन उलझ जाते हैं। वह श्री कृष्ण से पूछते हैं कि हम इन गुरुओं और श्रेष्ठ जनों को क्यों मारें, जो हमारे लिये पूजने योग्य हैं। इस पर अर्जुन को समझाते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं कि यह समझ लो कि ‘आत्मा’ को कोई मार नहीं सकता है और न आत्मा मरने वाली है। इस संसार में अधिकतर लोग अवसर मिलने पर अपने बेटे-बेटी, धन-दौलत और परिवार के बारे में बात करते हैं। कोई आत्मा की प्रकृति के बारे में बात नहीं करता।

आत्मा की प्रकृति को लेकर क्या कहते हैं सद्गुरु ?

सद्गुरु अपनी पुस्तक गीता ज्ञान मंदाकिनी में इन बातों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- “आत्मा की प्रकृति को समझाने वाली कृति पूरे विश्व में कहीं नहीं है। पश्चिमी देशों में ईसा ने केवल टेन कमांडेट का नियम दिया है और जैसे ही इन वेस्टर्न कंट्रीज में गीता अनुवादित होकर पहुंची वैसे ही इसने वहां के कई लोगों पर वैचारिक प्रभाव डाला। जिनमें राल्फ वाल्डो इमर्सन भी शामिल थे। जिन्होंने गीता पढ़ने के बाद श्री कृष्ण की कुछ बातों का विरोध किया था। उनका मानना था कि श्री कृष्ण से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि, वह हत्या करने की बात करेंगे।“

हालांकि गीता का अध्धयन करने के बाद इमर्सन का ये भी कहना था कि – “भगवद्गीता के साथ मेरा जीवन शानदार बीता। यह अपने तरह की पहली पुस्तक हैं जो भले ही किसी अन्य परिस्थिति में लिखी गई हो। लेकिन यह आज के समय में भी हमारे हर समस्याओं का जवाब पूरी स्पष्टता के साथ देती है।

क्या एक परदे के समान है इंसानी शरीर ?

इन बातों को लिखते वक्त सद्गुरु इंसानी शरीर को एक परदे के समान देखते हैं। इसको लेकर वह सिनेमा हॉल के परदे का उदाहरण देते हैं। जिस पर चल चित्र या फिल्मों को दिखाया जाता है। हालांकि फिल्म के दौरान वह परदा नहीं बल्कि उस पर चल रहे कैरेक्टर दिखते हैं। चाहे वो नायक-नायिका हो या उस मूवी से जुड़ा कोई अन्य किरदार। ठीक इसी तरह से भगवान कृष्ण, अर्जुन से कह रहे हैं कि यह शरीर जिसकी हम बात करते हैं। यह एक पर्दे के समान है, जिस पर केवल दृश्य उभरता है और आभास होता है कि इंसानों के द्वारा ही इस संसार में कई क्रियाएं की जा रही है। असल में देखा जाए तो भगवान ने इस संसार में प्रकृति को ही परदा बनाया है। जिसके पीछे कोई ‘परम पुरुष’ खेलता है और उसे सबकुछ सत्य प्रतीत होता है।

आत्मा के अमर होने का असली सत्य क्या है ?

श्री कृष्ण रणक्षेत्र में अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि तुम शरीर की बात कर रहे हो तो केवल एक परदे के बारे में बता रहे हो। अत: तुम ज्ञानी के समान बात करते हुए यह समझो कि आत्मा को कोई मार नहीं सकता है और कोई मारने की चेष्टा करे भी तो यह मर नहीं सकती है क्योंकि यह शाश्वत है और सत्य भी।

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज कहते हैं कि- “बाहर जो कुछ भी हम देखते हैं वह परमात्मा का फैलाव है. परमात्मा यदि केन्द्र-बिन्दु है तो यह सृष्टि परमात्मा की परिधि है। इस परिधि से हम और आप ईश्वर रूपी केन्द्र-बिन्दु तक पहुँच सकते हैं। इसी प्रकार जिस शरीर को हम देख रहे हैं। उसका केन्द्र-बिन्दु आत्मा है। इसलिए इसके माध्यम से हम आत्मा तक पहुंच सकते हैं।

आत्मा को लेकर क्या कहते थे संत कबीर ?

आत्मा और शरीर से जुड़ी बातों को आप संत कबीर की पंक्तियों से भी समझ सकते हैं… जिसमें वह कहते हैं कि –

तू कहता कागद लेखी… मैं कहता आंखन देखी

अर्थात युद्धभूमि में एक ओर अर्जुन जहां शास्त्रों की बातों के जरिए तर्क देने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी ओर श्री कृष्ण शास्त्रीय बातों को छोड़ आंखों देखी स्थिति को समझा रहे हैं। क्योंकि भगवान कृष्ण दृष्टा हैं जो यथास्थिति की बात करते हुए अर्जुन को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि हे अर्जुन! जो तुम्हारे सामने एक गुरु के समान खडे हैं उनके तुम अंदर झांकने की कोशिश करो। जिससे तुम्हें यह पता चल जाएगा कि उनके अंदर भी आत्मा है जो अमर है कभी मर नहीं सकती। इसलिए गुरु द्रोण जैसे अपने लोगों से युद्ध उनका शरीर देखकर नहीं बल्कि उनकी आत्मा देखकर करो।