कहाँ स्थित है मूलाधार चक्र? कुंडलिनी जागरण में क्या है इसकी भूमिका?

कुंडलिनी जागरण सीरीज़ पार्ट वन- मूलाधार चक्र

पातंजल योगशास्त्र सहित सनातन धर्म से लगभग सभी शास्त्रों में कुंडलिनी जागरण की महिमा गाई गई है। कहा जाता है कि राजयोग के द्वारा कुंडलिनी जागरण करने से व्यक्ति ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है।

लेकिन मूलाधार चक्र को जागृत किये बिना ये यात्रा संभव नहीं होती है। कहाँ स्थित है मूलाधार चक्र और कुंडलिनी जागरण में क्या होती है इसकी भूमिका? इसे सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी ने अपनी पुस्तकें ‘कुंडलिनी जागरण’ और ‘लोक-परलोक’ में विस्तार से बताया है।

कैसा दिखता है मूलाधार चक्र और क्या है इसका रहस्य?

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि मूलाधार चक्र हमारे शरीर के अंदर हमारे गुदा क्षेत्र से दो अंगुल उपर होता है। यही सात चक्रों में पहला चक्र है। इसमें चार दल कमल हैं। इसका रंग लाल है।

 इन चार कमल दलों पर व, श,ष,और स ये ही चार अक्षर हैं। इसके मध्य में गणेश जी और उनकी पत्नियाँ ऋद्धि सिद्धि भी उनके साथ विराजमान रहती हैं। चंद्र्मा भी अपनी पत्नी रोहिणी सहित यहीं बैठते हैं। 27 नक्षत्रों का वास भी यहीं है।

मूलाधार चक्र के पूरब कमल दल पर इंद्र अपनी पत्नी शचि के साथ विराजमान हैं। दक्षिण कमल दल पर यमराज अपनी पत्नी के साथ वास करते हैं तथा उत्तर दल पर कुबेर और चित्रपुरी है। इन सभी को साधक अपनी आध्यात्मिक यात्रा में ध्यान के द्वारा देख सकता है।

आद्या या आदि शक्ति भी यहीं वास करती हैं। यही विद्या का भंडार तथा वाणी का विकास भी यहीं से होता है। चौरासी लाख नाड़ियों का संयोजन भी मूलाधार चक्र से ही होता है इसलिए चौरासी लाख योनियों का खजाना भी यहीं है। सारी नाड़ियाँ भी यहाँ जुटती हैं।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में मूलाधार चक्र का रहस्य खोलते हुए लिखते हैं कि इंगला- पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ियों का संयोजन भी मूलाधार चक्र में ही होता है। यही वजह है कि जिस सिद्धि ऋद्धि के लिए तांत्रिक साधक जन्मों गवाँ देते हैं, वह सब इस पथ के साधक को सहज ही उपलब्ध हो जाता है।

मूलाधार चक्र के विकृत होने के परिणाम क्या हैं?

चूंकि प्रकृति द्वारा उपलब्ध कामवासना का केंद्र यही है और दक्ष प्रजापति भी यहीं रहते हैं, इसलिए मन का निवास भी यहीं रहता है। जीव यहीं से सृष्टि के निर्माण और प्रजनन का काम करता है। मन यहीं पुण्य और पाप में फँस जाता है।

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि चूंकि यौवन शक्ति का केंद्र यहीं है। इसलिए मन इसी में फंस कर इसी के इर्द गिर्द घूमता रहता है जो जन्मों जन्मों तक अपनी अधोगति को प्राप्त कर मुक्त नहीं होता है।


सद्गुरु कहते हैं कि ध्यान के द्वारा अपने मन का रुपांतरण करके ही अपनी काम भावना का रुपांतरण कर अपने मन को उर्ध्वगति की ओर ले जा सकता है। सद्गुरु कहते हैं कि जब मन उपर की तरफ चलता है तो इसकी अनंत तक जाने की संभावनाएं बनती हैं।
इस चक्र पर ध्यान मात्र से ही मन आनंदित हो जाता है। सारे रोग कष्ट स्वतः ही समाप्त होने लगते हैं। काव्य लेखन की क्षमता का सहज विकास होने लगता है। लेकिन ये तभी संभव है जब काम का दमन न करके उसका रुपांतरण किया जाए वरना इसके दुष्परिणाम भयावह होते हैं।

मूलाधार चक्र का जागरण कैसे करें?

सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि मूलाधार चक्र को जाग्रत करने के लिए साधक गुरु की आज्ञा लेकर सबसे पहले गणेश जी का षोडस विधि मानसिक पूजन करे। तत्पश्चात उनकी पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि की और वाहन मूषक की भी पूजा करें। गणेश जी को लड्डू का भोग लगाए।

इसके बाद गणेश जी का ही आदेश लेकर साधक कुबेरपुरी या चंद्रपुरी या फिर यमपुरी का दर्शन कर सकता है। जिस भी लोक में साधक भ्रमण करता है, वहाँ के देवता का षोडस विधि से पूजन कर उनका आदेश प्राप्त कर उनके द्वारा अधिकृत देवता के साथ ही उस लोक को घूमा जा सकता है।

मूलाधार चक्र का गुण धर्म क्या है?

मूलाधार चक्र कर्म सिद्धांत का प्रतीक है। यहीं कुंडलिनी सोई रहती है। जिसका जागृत होना ही विस्फोट है। पातंजल योग के अनुसार यही क्रिया योग का भी केंद्र है। सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की मान्यता भी यही है।

शारीरिक विकास इसी मूलाधार चक्र का गुण धर्म है। मूलाधार चक्र की वजह से ही हमारा शरीर भोज्य पदार्थो की डिमांड करता है। इसकी पूर्ति के बाद विश्राम की मांग करता है। मूलाधार चक्र की शक्ति से ही हमारे शरीर में रक्त, हड्डी और मांस का निर्माण होता है। कमर के नीचे के रोग या ग्रंथि इसी चक्र के असंतुलन से होता है।

क्रिया योग और मूलाधार चक्र का रिश्ता क्या है?

क्रिया योग का वर्णन गुरु गोरखनाथ से लेकर कबीर साहेब ने किया है, लेकिन सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी ने ही पहली बार अपनी पुस्तकें ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में क्रिया योग और मूलाधार चक्र के बीच का रिश्ता स्थापित किया है।

पूज्य सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि क्रिया योग के द्वारा ही योगी मूलाधार चक्र से कुंडलिनी जागरण की शुरुआत करते हैं। क्रिया योग के द्वारा मूलाधार चक्र के जागरण के साथ ही योगियों को कई प्रकार की ऋद्धियाँ औऱ सिद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। फिर कालांतर में समाधि का भी स्वप्न होने लगता है।

चूंकि मूलाधार चक्र के जागरण के साथ ही समाधि का स्वप्न होने लगता है इसलिए कई क्रिया योग के साधक योगीजन जन्मों जन्मों तक यहीं फंसे रुके रह जाते हैं। मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता गणेश जी इन्हें बाहर जाने भी नहीं देते हैं और इनकी समग्र आवश्यकताओं की पूर्ति भी करते रहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण इन सांसारिक कर्मों में फंसे योगीजनो और आमजनों की इस दुविधा को गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 47 -51 तक बहुत अच्छे से समझाया है।

मूलाधार चक्र और कर्म का सिद्धांत

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में गीता के कर्म के सिद्धांत को बहुत ही सरल तरीके से समझाया है। सद्गुरु कहते हैं कि कर्म तीन तरह का होता है – क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और चिर संचित कर्म। सद्गुरु कहते हैं कि कर्म के भी तीन आयाम होते हैं। पहला वो कर्म जिसे उद्देश्य को ध्यान में रख कर किया जाए। दूसरा वो कर्म जो तत्काल हमारे सामने उपस्थित हो और तीसरा है फल यानी परिणाम।

क्या होता है क्रियमाण कर्म?

सद्गुरु कहते हैं कि क्रियमाण कर्म वो होता है जो कर्म हम वर्तमान में करते हैं। सद्गुरु कुंडलिनी जागरण के इच्छुक लोगों को कहते हैं कि आप अपने वर्तमान कर्मों अर्थात क्रियमाण कर्मों को योगमुक्त होकर करें। गुरु के निर्देशन में कर्तव्य समझ कर करें। सदैव गुरु पर्वत पर गुरु का ध्यान करें।

सद्गुरु बताते हैं कि गुरु पर्वत हमारे दोनों आँखों के मध्य भृकुटि से दो अंगुल उपर उभरा हुआ सा होता है। सद्गुरु उसी स्थान पर गुरु का ध्यान करने के लिए कहते हैं। सद्गुरु कहते हैं कि यही ध्यान कर्म कालांतर में संचित या प्रारब्ध कर्म एवं चिर संचित कर्म बन जाता है।

सद्गुरु क्रियमाण कर्म को सरल तरीके से समझाते हुए कहते हैं कि जिस कर्म का फल आपको तत्काल मिल जाता है वही क्रियमाण कर्म है। इसे उन्होंने सरल भाषा में समझाने के लिए बैंक का करेंट अकाउंट कहा है।

क्या होता है संचित कर्म या प्रारब्ध का कर्म?

सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में संचित कर्म को सरल तरीके से समझाने के लिए उसे बैंक का सेविंग अकाउंट कहा है। सद्गुरु कहते हैं कि वो कर्म जिसका फल तुरंत नहीं मिलता बल्कि दीर्घ काल में मिलता है, वही संचित या प्रारब्ध कर्म है।

सद्गुर उदाहरण स्वरुप कहते हैं कि बचपन की पढ़ाई का फल भविष्य में नौकरी के रुप में मिलता है। तो बचपन में किया गया कर्म हमारे सेविंग अकाउंट की तरह था जिसका रिजल्ट हमें नौकरी के रुप में मिला।

सद्गुरु कहते हैं कि ऐसा ही जन्मों जन्मों के संचित कर्म होते हैं जिसका फल कई बार हमें इस जन्म में मिलता है। हमारे पुण्य कर्म हमें पुण्यवान बनाते हैं और हमारे संचित पाप कर्मों की सजा कई बार हमें इस जन्म में मिलता है जिसे हम समझ नहीं पाते हैं। सद्गुरु ने इसे ही भाग्य कहा है।

क्या होता है चिर संचित कर्म?

सद्गुरु ने चिर संचित कर्म को भी बड़े सरल तरीके से समझाते हुए इसे बैंकिंग के टर्म में फिक्स डिपॉजिट कहा है। जैसे फिक्स डिपॉजिट में एक लंबें अंतराल तक पैसा जमा रहता है वैसे ही चिर संचित कर्म हमारी आत्मा के साथ जुड़े रहते हैं जो अनूकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर पुष्पित और फलित होते हैं।

सद्गुरु कैसे हमारे कर्मों की गति बदलते हैं?

सद्गुरु कहते हैं कि जो भी साधक होगा वो सद्गुरु के निर्दैशन में अपने समय का सदुपयोग करेगा। वह जगत में ऐसा कर्म करेगा कि कोई भी सांसारिक व्यक्ति अपने कर्म में उसके सामने फीका पड़ेगा। वह साधक कर्मयोगी बन जाएगा।

ऐसा कर्मयोगी जो सामने से दिखने में तो सांसारिक प्रतीत होगा लेकिन अंदर से देखनें में वो विरक्त दिखेगा। सद्गुरु कहते हैं कि वर्तमान में रहकर आत्मोत्थान हेतु साधना करते हुए जगत हित में कार्य करते रहना ही कर्मयोग है।

आप सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी की पुस्तकें ‘कुंडलिनी जागरण’ एवं ‘लोक-परलोक’ इस पते पर संपर्क कर मंगा सकते है

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