चपटी गोलाकार नुमा इस पृथ्वी पर आज करीब 195 देश हैं, जिसे दुनिया के मानचित्र में जगह मिली हुई है। हालांकि एक ही ग्रह पर बसे ये देश आज आपसी सद्भाव के साथ नहीं बल्कि दुश्मनों के जैसे रह रहे हैं, क्योंकि इनके बीच अपसी मत भेद की बीज पड़ गई है। इनमें एक दूसरे से अलगाव वाली खाई अब इस कदर तक बढ़ गई है कि वे अपने पड़ोसी मुल्क का भी खून बहाने के लिए तैयार हो गए हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि इस आपसी मतभेद के पीछे की असली वजह क्या है ? क्यों एक ही ग्रह पर रहने वाले लोग आपस में लड़ने के लिए तैयार है। इस लेख में हम आपको इस द्वंद के पीछे की वजह बताएंगे। जिसे सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी किताब उमा कहऊँ मैं अनुभव अपना में लिखा है।
” यह संसार एक पड़ाव है “
सद्गुरु इस दुनिया की कल्पना करते हुए कहते हैं कि यह संसार एक पड़ाव है। जहां से सभी लोगों को गुजरना है, हालांकि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन पर भगवान की असीम कृपा होती है और वह इस संसार से भी आगे की यात्रा करने में सफल हो जाते हैं। ऐसे लोगों को संत कबीर
” पारस परस पर होय न्यारा “
जैसे वाक्य से संबोधित करते हैं, जिसका मतलब होता है कि जिस इंसान पर भगवान की कृपा हो जाती है। वह इस संसार की भीड़ में नहीं फंसता है, क्योंकि उसके लिए कुछ भी करने या सीखने के लिए बचा नहीं होता है। चूंकि इस संसार में जो फंसे रहते हैं, वह अपने जीवन में विफल रहते हैं, जो सफल हो जाते हैं वे बुद्ध, महावीर, कृष्ण और कबीर जैसे मूक बनकर ज्ञान को प्राप्त हो जाते हैं।
स्त्रैणचित्त को लेकर क्या कहते हैं भगवान शंकर ?
सद्गुरु अपनी किताब में शक्तिपात से चक्रों की यात्रा में स्त्रैण चित्त का जिक्र करते हैं, जो दो या दो से अधिक देशों के बीच बन रही दुश्मनी वाली खाई को वर्णित करती है। इसके बारे में बताते हुए वह भगवान शिव और उमा से जुड़े प्रसंग का जिक्र करते हैं जब भगवान शंकर उमा से कहते हैं कि… ‘स्त्रैणचित्त ही उत्तम चित्त होता है, जिसके पास धैर्यता होती है। वह प्रतीक्षा करने के साथ खुद पर आने वाले विकट वेदना को भी सहन करना जानता है। यह जरूरी नहीं कि सभी स्त्रियां स्त्रैण चित्त की हों और सभी पुरुष, पुरुष चित्त के, बल्कि कुछ पुरुषों के पास स्त्री चित्त भी हो सकता है और स्त्रियों के पास भी पुरुष चित्त’ आपको बता दे कि यहां भगवान शंकर एक सद्गुरु के रूप में हैं और उमा शिष्य के रूप में।
आज के समाज में पुरुषोचित्त – स्त्रैणचित्त का क्या मतलब है ?
पुरुषोचित्त और स्त्रैण चित्त मनुष्य मन के आधे-आधे हिस्से में होते हैं, लेकिन स्त्रैण चित्त हर समय वर्तमान में रहना चाहता है। वह अपने इर्द-गिर्द घूमता रहता है। विश्व स्तर पर देखा जाय तो पूरब स्त्री चित्त है, जबकि पश्चिम पुरुष चित्त है। पूरब ने कभी समय को लेकर चिन्ता नहीं की लेकिन पश्चिम अधिकतर समय के पीछे भागता रहता है। असल में पूरब धीरे-धीरे गति से चलता है लेकिन पश्चिम तीव्र गति के साथ क्रान्ति चाहता है।
यही कारण है कि पूर्वी राष्ट्र स्त्रेण चित्त यानी नारियों के पक्ष में बातें करते हैं, जिनमें भारत जैसा बड़ा देश भी शामिल है। वहीं पश्चिमी देश पुरुषोचित गुण अर्थात पुरुषों के जैसे अहंकार, सम्मान, स्वतन्त्रता, विद्रोह, जल्द-बाजी और वासना जैसे लक्षणों को धारण करते हैं, जिनमें अमेरिका जैसा बड़ा देश शामिल है।
पुरुषोचित्त – स्त्रैणचित्त को लेकर क्या कहते हैं सद्गुरु ?
सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज इन बातों का जिक्र करते हुए अपनी किताब ‘उमा कहऊं मैं अनुभव अपना’ में कहते हैं कि- “स्त्रैण चित्त वाले लोग देश समर्पण, आज्ञाकारिता मौनता को स्वीकार करते हैं, जो किसी भी काम को प्रेम पूर्वक करना पसंद करते हैं। जबकि पुरुष चित्त वाले देश तर्क वादी के साथ संदेहवादी भी होते हैं और वह केवल दिमाग से काम लेते हैं”