क्या सच में हम अपने पिछले जन्म को जान सकते हैं?

PIchala Janam

अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है, हमारे पिछले जन्म में हम क्या थे? क्या आज जो सुख-दुःख हम भोग रहे हैं, वह हमारे पुराने कर्मों का परिणाम है? क्या यह हमारे प्रारब्ध का हिस्सा है? कई लोग इन प्रश्नों के उत्तर के लिए तांत्रिकों, ज्योतिषियों और कर्मकाण्डियों के पास जाते हैं, लेकिन सत्य उनसे नहीं जाना जा सकता। इस रहस्य को केवल वही व्यक्ति जान सकता है जो स्वर साधना में निपुण हो जो अपने श्वास, प्राण और मन को पहचान चुका हो। सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘स्वर से समाधि’ के छठे अध्याय ‘पूर्व जन्म की बात जानना’ में इस रहस्य का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उनके अनुसार, पूर्व जन्म का अनुभव कोई चमत्कार नहीं, बल्कि साधना की सिद्ध अवस्था है।

स्वर साधना क्या है?

आज के समय के सद्गुरु स्वामी स्वामी कृष्णानंद जी महाराज जी लिखते हैं,जब साधक अपने स्वर को पहचान लेता है, तो वही स्वर उसे उसके मूल स्रोत तक पहुँचा देता है। इसके लिए तीन बातें अत्यंत आवश्यक हैं दीक्षा, ध्यान और धैर्य। स्वर साधना के अभ्यास से साधक का ध्यान धीरे-धीरे आज्ञाचक्र पर स्थिर होने लगता है। और एक दिन ऐसा आता है जब मन की परतें हटने लगती हैं – सामने जीवन की “रील” चलने लगती है पहले वर्तमान, फिर बाल्यकाल, फिर गर्भ का दृश्य और अंत में… पूर्व जन्म की झलकियाँ। यह अनुभव मानो किसी चलचित्र की तरह प्रतीत होता है, जहाँ आत्मा स्वयं अपना अतीत देख रही हो। सद्गुरु स्वामी स्वामी कृष्णानंद जी महाराज जी आगे बताते है कि,कब खतरनाक बन जाता है यह ज्ञान। इस पर सद्गुरु चेतावनी देते हैं कि,जब तक साधक में धैर्य और सामर्थ्य नहीं, तब तक यह ज्ञान खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि हर जन्म की स्मृति सुखद नहीं होती। वे आगे कहते हैं कि प्रकृति ने मनुष्य पर भूलने का आवरण इसलिए डाला है ताकि हम वर्तमान में जी सकें। यदि यह आवरण हट जाए तो मनुष्य अतीत के बोझ से टूट जाएगा। इसलिए हर जिज्ञासा का उत्तर तभी मिलना चाहिए जब साधक पूर्ण रूप से तैयार हो।

एक सच्ची घटना से उजागर हुआ सत्य

बात सन 1985 की बात है,मध्यप्रदेश का एक व्यक्ति वाराणसी में स्वामी जी के पास पहुँचा। वह एक प्रशासनिक अधिकारी जैसा दिखता था, पर भीतर से टूटा हुआ था। वह कुष्ठ रोग से ग्रसित था, चेहरे और शरीर पर धब्बे, परिवार का तिरस्कार, समाज की घृणा से वह मरने की सोच चुका था। एक शुभचिंतक ने कहा,वाराणसी जाओ, वहाँ एक संत हैं महाराज जी। वे भूखा-प्यासा वह उनके पास पहुँचा।

और महाराज जी ने शांति से मिला, मिलते है महाराज जी ने कहा बालक पहले स्नान करो, भोजन करो, फिर संध्या को आओ। फिर उन्होंने एक साधना विधि दी। सूर्योदय से पहले ध्यान, प्राणायाम और मंत्र-जप। नमक का त्याग, एकांत व्रत और ईश्वर पर पूर्ण भरोसा।

साधना का परिणाम

एक वर्ष बाद वह व्यक्ति दोबारा महाराज जी के पास लौटा। अब उसके चेहरे पर तेज़ था, रोग मिट चुका था, घर में सुख-शांति थी। उसने कहा,गुरुदेव अब मुझे अपना पूर्व जन्म दिखाइए।स्वामी जी मुस्कराए पहले अपने मन को तैयार करो। इक्कीस दिन की साधना करो। वह आज्ञा का पालन करते हुए घर लौटा। बीसवें दिन अचानक वह व्यक्ति अजीब बोलने लगा….रील मत दिखाओ गुरुदेव! मुझे बचा लो…”परिवार घबरा गया। महाराज जी ने ध्यान में जाकर उसके मस्तिष्क पर हाथ रखा, कुछ ही क्षणों में वह शांत हो गया।

पूर्व जन्म का दर्शन

जब उसने आँखें खोलीं तो बोला,गुरुदेव मैंने सब देखा तीन जन्म पहले मैं कसाई था। मैंने अनेक जीवों की हत्या की थी। उन्हीं का श्राप मुझे इस जन्म में कुष्ठ रोग बनकर मिला। वह रोने लगा और बोला यदि आप न मिलते, तो मैं गल-गल कर मरता। स्वामी जी ने कहा ,अब जब सत्य जान लिया है, तो उसे तप में बदल दो। जो अपने अतीत को स्वीकार करता है, वही मुक्त होता है।”

पूर्व जन्म की स्मृति – वरदान या परीक्षा?

इस विषय पर सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी कहते हैं,पूर्व जन्म की स्मृति कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि परीक्षा है। जो व्यक्ति अपने अतीत को देख लेता है, उसे अपने मन और कर्मों पर पूरा नियंत्रण रखना पड़ता है। क्योंकि अब वह जान चुका है कि हर सुख-दुःख, हर जन्म, हर पीड़ा उसके अपने ही कर्मों से रची हुई है। पूर्व जन्म को जानना संभव है, पर उससे भी बड़ा ज्ञान है अपने वर्तमान को सुधारना।जब साधक अपने स्वर को पहचान लेता है,तो उसे न अतीत की चिंता रहती है, न भविष्य का भय बस शेष रह जाता है सत्य का अनुभव।