कुंडलिनी जागरण में पहले चक्र यानि मूलाधार चक्र के जाग्रत होने के बाद जो दूसरा चक्र आता है वो है स्वाधिष्ठान चक्र। पूज्य सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपनी पुस्तकें ‘लोक-परलोक’ और ‘कुंडलिनी जागरण’ में स्वाधिष्ठान चक्र के रहस्य को पहली बार दुनिया के सामने खोला है।
स्वाधिष्ठान चक्र मूलाधार चक्र से दो अंगुल उपर और नाभि से छह अंगुल नीचे होता है। सद्गुरु स्वाधिष्ठान चक्र की लोकेशन को ठीक ठीक बताते हुए कहते हैं कि यह कामेंद्रिय के ठीक पीछे सुषुम्ना नाड़ी में स्थित होता है।
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि इस चक्र का रंग पीला है और यह छह कमल दल है। इन छह कमल दलों पर य, र,ल,व, भ और म में ही 6 अक्षर यहाँ से उत्पन्न होते हैं। ‘य’ स्थान वाले कमल दल पर विराजमान होकर ब्रह्मा यहीं से सृष्टि की रचना करते हैं। ब्रम्हा के साथ सरस्वती भी यहां विराजमान रहती हैं। यहाँ भी दक्ष प्रजापति रहते हैं। बसंत ऋतु भी यहीं रहता है।
दूसरे कमल दल जहाँ से ‘र’ उत्पन्न होता है वहीं अग्नि भी विराजमान होती है क्योंकि ‘रं’ अग्नि का बीज मंत्र भी है। ग्रीष्म ऋतु भी यहीँ रहती है। रमण, राम, राम यहीं से रमण करता है।
तीसरे कमल दल के अक्षर ‘ल’ को पृथ्वी का बीज तत्व माना जाता है।यहाँ वर्षा ऋतु का निवास है। स्वाधिष्ठान चक्र के इस कमल दल पर इंद्र देवता वास करते हैं। यहीं से वो इंद्रलोक का संचालन करते हैं।
जबकि चौथे कमल दल के अक्षर ‘व’ को आकाश तत्व का बीज माना जाता है। शिशिर ऋतु यहीं रहती है। ब्रह्मपुरी का भाव भी यहीं से उत्पन्न होता है। जहाँ तक पांचवे कमल दल के अक्षर ‘भ’ की बात है तो मन में भ्रम यहीं से उत्पन्न होता है और शरद ऋतु भी यहीं वास करत है।
अब बात करें स्वाधिष्ठान चक्र के छठे कमल दल की जिसका अक्षर भ है। यहाँ हेमंत ऋतु वास करती है। यहाँ माया का महल है,इसलिए मोह माया यहीं से उत्पन्न होती है। र- कार यानि जब जीव सत्याकार हो जाता है तो म-कार आनंद रुप अपने आप उपल्ब्ध हो जाता है।
जहाँ मूलाधार चक्र में में पृथ्वी तत्व की प्रधानता है वहीं इस चक्र में जल की प्रधानता है। जहाँ मूलाधार चक्र में गणपति अपनी पत्नी ऋद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान हैं , वहीं इस स्वाधिष्ठान चक्र में ब्रह्मा जी का सरस्वती जी के साथ वास है।
स्वाधिष्ठान चक्र की विशेषताएं क्या हैं?
स्वाधिष्ठान चक्र की विशेषताएं बताते हुए सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि इस चक्र की वजह से ही हमारे अंदर कामवासनाओं का विकास होता है। लेकिन अगर इस चक्र में कोई विकृति आ जाती है तो हमें कई प्रकार के यौन विकारों का सामना करना पड़ता है।
चूंकि स्वाधिष्ठान चक्र को हमारी जननेंद्रियों के समीप माना जाता है, इसलिए इसमें आई विकृति की वजह से रक्त संबंधी रोगों के अलावा मूत्र और प्रजनन संबंधी विकार भी प्रकट हो जाते हैं।
सद्गुरु कहते हैं कि इस चक्र पर स्वभावतः भय, काम, क्रोध, हिंसा और घृणा की प्रधानता होती है। हमारे अंदर जो भी कामवासना है, भय की भावना है या फिर क्रोध और हिंसा की तरफ हमारा आकर्षण है , वो इसी चक्र के विकार से उत्पन्न हुआ है।
स्वाधिष्ठान चक्र और ब्रह्मा जी की कामवासना का संबंध
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में उस कथा का रहस्य भी खोलते हैं जिसके अनुसार ब्रह्मा जी अपनी पुत्री सरस्वती को देख कर कामाँध हो गए थे, जिसकी वजह से आज भी संसार में ब्रह्मा की पूजा नहीं होती है।
‘लोक-परलोक’ में कहा गया है कि ब्रह्मा चूंकि स्वाधिष्ठान चक्र के अधिपति हैं इसलिए वो भी कामवासना से ग्रसित हो जाते हैं। स्वाधिष्ठान चक्र पर वास करने की वजह से ही ब्रह्मा अपने रिश्तों का ख्याल नहीं रखते हैं।
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में कहते हैं कि ब्रह्मा जी का अपनी पुत्री सरस्वती और बहन सावित्री के साथ कामुक व्यवहार की वो वजह है जिसकी वजह से कबीर ने उनके लिए कहा था कि “ब्रम्हा तोहर कवन भल भयउ। धीया दियो नसाय।‘
सद्गुरु इसकी वजह बताते हुए कहतें हैं कि ब्रह्मा के इस व्यवहार की वजह ही है स्वाधिष्ठान चक्र पर उनका वास करना जहाँ काम की प्रधानता है। काम वासना में कोई व्यक्ति अपने रिश्तों को भी नहीं पहचानता है। इसलिए ब्रह्मा से ये पाप हुए।
क्या सृष्टि की रचना स्वाधिष्ठान चक्र से हुई है?
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि चूंकि स्वाधिष्ठान चक्र का प्रधान स्वभाव ही काम है, यही वजह है कि ब्रह्मा सृष्टि की रचना कर सके। चूंकि ब्रह्मा का काम ही है सृजन करना,इसलिए उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि सृजन किस तरह से हो।
काम का तो स्वभाव ही है वासना में लिप्त रहना । अब काम का दमन करेंगे तो क्रोध उत्पन्न होगा। जो काम से सूक्ष्म है। क्रोध का दमन करने से वो लोभ में बदल जाएगा। लोभ से मन मस्तिष्क भर जाएगा तो लोभ मोह में बदल जाएगा। दअसल ये सभी काम के ही विस्तार हैं या कहें तो स्वाधिष्ठान चक्र की माया है। स्वाधिष्ठान चक्र के निकली काम वासना में लिप्त होने की वजह से ही लोग जन्म जन्मांतर तक इस संसार चक्र में फंसे रहते हैं।
सद्गुरु और स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘लोक-परलोक’ में लिखते हैं कि इस स्वाधिष्ठान चक्र से निकली काम वासना और उसकी विकृतियों को भी पार किया जा सकता है। इसके लिए सद्गुरु के निर्देशन में काम की भावना को समाधि में बदलने की कला सीखनी होती है।
सद्गुरु कहते हैं कि काम क्रिया यानि संभोग के समय व्यक्ति क्षण भर के लिए अहंकार शून्य , विचार शून्य होता है। बस उसी क्षण आपको सजग रहना है। अगर सद्गुरु की कृपा आप पर है तो आपका मन तुरंत वैरागी हो जाता है ।
वैरागी मन ही विचार शून्यता को उपलब्ध होकर ध्यान को प्राप्त कर जाता है और आप सद्गुरु की कृपा से तत्काल स्वाधिष्ठान चक्र को जाग्रत कर उससे पार चले जाते हैं और समाधि को उपलब्ध हो जाते हैं।
स्वाधिष्ठान चक्र को कैसे जागृत करें?
सद्गुरु अपनी पुस्तक ‘कुंडलिनी जागरण’ में लिखते हैं कि साधक जब अपने सद्गुरु के निर्देशन में ध्यान के द्वारा इस चक्र में पहुंचता है तब यहाँ का सारा अलौकिक स्वरुप दृष्टिगोचर होने लगता है।
अक्सर साधक के 6 से 11 हजार श्वासों के जाप से कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र तक पहुंच जाती है। प्रत्येक श्वास से सतनाम के सहारे सुरत को लेकर पहुंचने पर ऐसा हो जाता है। उपर बताए तरीके से साधक सबसे पहले ब्रह्मा और सरस्वती की षोडस तरीके से मानसिक पूजा कर वस्त्र, भोग अर्पण करे। तत्पश्चात ब्रह्मा से आदेश लेकर ही अन्य दल पर भ्रमण हेतु प्रस्थान करे।
स्वाधिष्ठान चक्र में कुंडलिनी के पहुंचने पर साधक का शरीर भी बदलता है। जिसे भाव शरीर भी कहते हैं। इस चक्र पर प्राकृतिक रुप से मिली संभावना का रुपांतरण भी स्वतः ही होने लगता है।
स्वाधिष्ठान चक्र की प्राकृतिक संभावना है- भय, क्रोध, हिंसा और घृणा। या तो साधक इसी में फंस कर रह जाता है या ब्रह्मचर्य की तरह इसका भी दमन कर सकता है।जो अत्यंत खतरनाक है। साधक को हर हाल में दमन नहीं बल्कि रुपांतरण का सहारा लेकर ही आगे बढ़ना श्रेयस्कर है। इस चक्र पर पहुंचने पर साधक अपने को प्रेम से परिपूर्ण पाता है।अब उसमें घृणा नहीं रहती है।इस स्थिति में भय का रुपांतरण निर्भयता में हो जाता है।
आप सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी की पुस्तकें ‘कुंडलिनी जागरण’ एवं ‘लोक-परलोक’ इस पते पर संपर्क कर मंगा सकते है
🏢 पता: सद्गुरु धाम आश्रम, H-243, कुंवर सिंह नगर, निलौटी मोड़, नांगलोई, दिल्ली – 110041
📞 फोन: +91 9013547660